Sad Poetry (page 210)

अपनी बेटी के नाम

अतीया दाऊद

मिरी मुश्किल अगर आसाँ बना देते तो अच्छा था

अतीक़ुर्रहमान सफ़ी

कोई नहीं हमारा पुर्सान-ए-हाल अब के

अतीक़ुर्रहमान सफ़ी

जीवन-भर की आस है तू

अतीक़ुर्रहमान सफ़ी

जिस को चाहा था कब मिला मुझ को

अतीक़ुर्रहमान सफ़ी

अन-गिनत अज़ाब हैं रतजगों के दरमियाँ

अतीक़ुर्रहमान सफ़ी

नाक़ूस की सदाओं से और न अज़ान से

अतीक़ मुज़फ़्फ़रपुरी

दिल लगाना चाहिए चल कर किसी हैवान से

अतीक़ मुज़फ़्फ़रपुरी

अल्फ़ाज़ न दे पाएँ अगर साथ बयाँ का

अतीक़ मुज़फ़्फ़रपुरी

आसमाँ गर्दिश में था सारी ज़मीं चक्कर में थी

अतीक़ मुज़फ़्फ़रपुरी

क़रीब से न गुज़र इंतिज़ार बाक़ी रख

अतीक़ असर

मसर्रत और ग़म दोनों की कोई हद ज़रूरी है

अतीक़ असर

शिकायत है बहुत लेकिन गिला अच्छा नहीं लगता

अतीक़ असर

क़रीब से न गुज़र इंतिज़ार बाक़ी रख

अतीक़ असर

ग़म ये नहीं कि ग़म से मुलाक़ात हुई

अतीक़ असर

ग़म की बंद मुट्ठी में रेत सा मिरा जीवन

अतीक़ अंज़र

दूर मुझ से रहते हैं सारे ग़म ज़माने के

अतीक़ अंज़र

उदास बैठा दिए ज़ख़्म के जलाए हुए

अतीक़ अंज़र

सुलगती रेत की क़िस्मत में दरिया लिख दिया जाए

अतीक़ अंज़र

फूल पर ओस है आरिज़ पे नमी हो जैसे

अतीक़ अंज़र

मिरी ज़िंदगी किसी मोड़ पर कभी आँसुओं से वफ़ा न दे

अतीक़ अंज़र

किसी ने भेजा है ख़त प्यार और वफ़ा लिख कर

अतीक़ अंज़र

जिस्म के घरौंदे में आग शोर करती है

अतीक़ अंज़र

जिस की ख़ातिर मैं ने दुनिया की तरफ़ देखा न था

अतीक़ अंज़र

गुज़िश्ता रात कोई चाँद घर में उतरा था

अतीक़ अंज़र

दिल के आँगन में तिरी याद का तारा चमका

अतीक़ अंज़र

बा'द मुद्दत मिले कुछ कहा न सुना भर गए ज़ख़्म पुरवाइयाँ सो गईं

अतीक़ अंज़र

अश्क इन आँखों से हम दिल में बहा कर देखें

अतीक़ अंज़र

नवाज़ता था हमेशा वो ग़म की दौलत से

अतीक़ इलाहाबादी

ज़ब्त की हद से हो के गुज़रना सो जाना

अतीक़ इलाहाबादी