Sad Poetry (page 97)
मुद्दत हुई है यार को मेहमाँ किए हुए
ग़ालिब
मिलती है ख़ू-ए-यार से नार इल्तिहाब में
ग़ालिब
मिरी हस्ती फ़ज़ा-ए-हैरत आबाद-ए-तमन्ना है
ग़ालिब
मेहरबाँ हो के बुला लो मुझे चाहो जिस वक़्त
ग़ालिब
मस्ती ब-ज़ौक़-ए-ग़फ़लत-ए-साक़ी हलाक है
ग़ालिब
माना-ए-दश्त-नवर्दी कोई तदबीर नहीं
ग़ालिब
मैं उन्हें छेड़ूँ और वो कुछ न कहें
ग़ालिब
महरम नहीं है तू ही नवा-हा-ए-राज़ का
ग़ालिब
लूँ वाम बख़्त-ए-ख़ुफ़्ता से यक-ख़्वाब-ए-खुश वले
ग़ालिब
लो हम मरीज़-ए-इश्क़ के बीमार-दार हैं
ग़ालिब
लाज़िम था कि देखो मिरा रस्ता कोई दिन और
ग़ालिब
लरज़ता है मिरा दिल ज़हमत-ए-मेहर-ए-दरख़्शाँ पर
ग़ालिब
क्यूँ न हो चश्म-ए-बुताँ महव-ए-तग़ाफ़ुल क्यूँ न हो
ग़ालिब
क्यूँ जल गया न ताब-ए-रुख़-ए-यार देख कर
ग़ालिब
क्या तंग हम सितम-ज़दगाँ का जहान है
ग़ालिब
कोई उम्मीद बर नहीं आती
ग़ालिब
कोई दिन गर ज़िंदगानी और है
ग़ालिब
कोह के हों बार-ए-ख़ातिर गर सदा हो जाइए
ग़ालिब
किसी को दे के दिल कोई नवा-संज-ए-फ़ुग़ाँ क्यूँ हो
ग़ालिब
कार-गाह-ए-हस्ती में लाला दाग़-सामाँ है
ग़ालिब
करे है बादा तिरे लब से कस्ब-ए-रंग-ए-फ़रोग़
ग़ालिब
कहूँ जो हाल तो कहते हो मुद्दआ' कहिए
ग़ालिब
कहते तो हो तुम सब कि बुत-ए-ग़ालिया-मू आए
ग़ालिब
कहते हो न देंगे हम दिल अगर पड़ा पाया
ग़ालिब
कभी नेकी भी उस के जी में गर आ जाए है मुझ से
ग़ालिब
कब वो सुनता है कहानी मेरी
ग़ालिब
जुज़ क़ैस और कोई न आया ब-रू-ए-कार
ग़ालिब
जुनूँ की दस्त-गीरी किस से हो गर हो न उर्यानी
ग़ालिब
जिस जा नसीम शाना-कश-ए-ज़ुल्फ़-ए-यार है
ग़ालिब
जराहत तोहफ़ा अल्मास अर्मुग़ाँ दाग़-ए-जिगर हदिया
ग़ालिब