Sad Poetry (page 99)
ग़म नहीं होता है आज़ादों को बेश अज़-यक-नफ़स
ग़ालिब
ग़म खाने में बूदा दिल-ए-नाकाम बहुत है
ग़ालिब
ग़ाफ़िल ब-वहम-ए-नाज़ ख़ुद-आरा है वर्ना याँ
ग़ालिब
गर्म-ए-फ़रियाद रखा शक्ल-ए-निहाली ने मुझे
ग़ालिब
गर तुझ को है यक़ीन-ए-इजाबत दुआ न माँग
ग़ालिब
गर न अंदोह-ए-शब-ए-फ़ुर्क़त बयाँ हो जाएगा
ग़ालिब
गर ख़ामुशी से फ़ाएदा इख़्फ़ा-ए-हाल है
ग़ालिब
गई वो बात कि हो गुफ़्तुगू तो क्यूँकर हो
ग़ालिब
फ़रियाद की कोई लय नहीं है
ग़ालिब
एक एक क़तरे का मुझे देना पड़ा हिसाब
ग़ालिब
दोस्त ग़म-ख़्वारी में मेरी सई फ़रमावेंगे क्या
ग़ालिब
दोनों जहाँ दे के वो समझे ये ख़ुश रहा
ग़ालिब
दीवानगी से दोश पे ज़ुन्नार भी नहीं
ग़ालिब
दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है
ग़ालिब
दिल मिरा सोज़-ए-निहाँ से बे-मुहाबा जल गया
ग़ालिब
दिल लगा कर लग गया उन को भी तन्हा बैठना
ग़ालिब
दिल ही तो है न संग-ओ-ख़िश्त दर्द से भर न आए क्यूँ
ग़ालिब
धोता हूँ जब मैं पीने को उस सीम-तन के पाँव
ग़ालिब
धमकी में मर गया जो न बाब-ए-नबर्द था
ग़ालिब
देख कर दर-पर्दा गर्म-ए-दामन-अफ़्शानी मुझे
ग़ालिब
दर्द से मेरे है तुझ को बे-क़रारी हाए हाए
ग़ालिब
दर्द मिन्नत-कश-ए-दवा न हुआ
ग़ालिब
बिसात-ए-इज्ज़ में था एक दिल यक क़तरा ख़ूँ वो भी
ग़ालिब
बज़्म-ए-शाहंशाह में अशआर का दफ़्तर खुला
ग़ालिब
बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल है दुनिया मिरे आगे
ग़ालिब
बला से हैं जो ये पेश-ए-नज़र दर-ओ-दीवार
ग़ालिब
बहुत सही ग़म-ए-गीती शराब कम क्या है
ग़ालिब
बाग़ पा कर ख़फ़क़ानी ये डराता है मुझे
ग़ालिब
अज़-मेहर ता-ब-ज़र्रा दिल-ओ-दिल है आइना
ग़ालिब
अर्ज़-ए-नियाज़-ए-इश्क़ के क़ाबिल नहीं रहा
ग़ालिब