Sad Poetry (page 98)
जादा-ए-रह ख़ुर को वक़्त-ए-शाम है तार-ए-शुआअ'
ग़ालिब
जब तक दहान-ए-ज़ख़्म न पैदा करे कोई
ग़ालिब
इशरत-ए-क़तरा है दरिया में फ़ना हो जाना
ग़ालिब
इश्क़ तासीर से नौमीद नहीं
ग़ालिब
इश्क़ मुझ को नहीं वहशत ही सही
ग़ालिब
हुज़ूर-ए-शाह में अहल-ए-सुख़न की आज़माइश है
ग़ालिब
हुस्न-ए-बे-परवा ख़रीदार-ए-माता-ए-जल्वा है
ग़ालिब
हुस्न ग़म्ज़े की कशाकश से छुटा मेरे बअ'द
ग़ालिब
हम से खुल जाओ ब-वक़्त-ए-मय-परस्ती एक दिन
ग़ालिब
हम पर जफ़ा से तर्क-ए-वफ़ा का गुमाँ नहीं
ग़ालिब
हुजूम-ए-नाला हैरत आजिज़-ए-अर्ज़-ए-यक-अफ़्ग़ँ है
ग़ालिब
हुजूम-ए-ग़म से याँ तक सर-निगूनी मुझ को हासिल है
ग़ालिब
हुई ताख़ीर तो कुछ बाइस-ए-ताख़ीर भी था
ग़ालिब
हवस को है नशात-ए-कार क्या क्या
ग़ालिब
हासिल से हाथ धो बैठ ऐ आरज़ू-ख़िरामी
ग़ालिब
हसद से दिल अगर अफ़्सुर्दा है गर्म-ए-तमाशा हो
ग़ालिब
हरीफ़-ए-मतलब-ए-मुश्किल नहीं फ़ुसून-ए-नियाज़
ग़ालिब
हर क़दम दूरी-ए-मंज़िल है नुमायाँ मुझ से
ग़ालिब
हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है
ग़ालिब
हैराँ हूँ दिल को रोऊँ कि पीटूँ जिगर को मैं
ग़ालिब
है वस्ल हिज्र आलम-ए-तमकीन-ओ-ज़ब्त में
ग़ालिब
है सब्ज़ा-ज़ार हर दर-ओ-दीवार-ए-ग़म-कदा
ग़ालिब
है बस-कि हर इक उन के इशारे में निशाँ और
ग़ालिब
गुलशन में बंदोबस्त ब-रंग-ए-दिगर है आज
ग़ालिब
गुलशन को तिरी सोहबत अज़-बस-कि ख़ुश आई है
ग़ालिब
गिला है शौक़ को दिल में भी तंगी-ए-जा का
ग़ालिब
ग़ुंचा-ए-ना-शगुफ़्ता को दूर से मत दिखा कि यूँ
ग़ालिब
घर में था क्या कि तिरा ग़म उसे ग़ारत करता
ग़ालिब
घर हमारा जो न रोते भी तो वीराँ होता
ग़ालिब
ग़म-ए-दुनिया से गर पाई भी फ़ुर्सत सर उठाने की
ग़ालिब