Sad Poetry (page 95)
आतिश-ए-दोज़ख़ में ये गर्मी कहाँ
ग़ालिब
आता है दाग़-ए-हसरत-ए-दिल का शुमार याद
ग़ालिब
आशिक़ी सब्र-तलब और तमन्ना बेताब
ग़ालिब
आए है बेकसी-ए-इश्क़ पे रोना 'ग़ालिब'
ग़ालिब
ज़ुल्मत-कदे में मेरे शब-ए-ग़म का जोश है
ग़ालिब
ज़िंदगी अपनी जब इस शक्ल से गुज़री 'ग़ालिब'
ग़ालिब
ज़िक्र उस परी-वश का और फिर बयाँ अपना
ग़ालिब
ज़िक्र मेरा ब-बदी भी उसे मंज़ूर नहीं
ग़ालिब
ज़ख़्म पर छिड़कें कहाँ तिफ़्लान-ए-बे-परवा नमक
ग़ालिब
ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार होता
ग़ालिब
ये हम जो हिज्र में दीवार-ओ-दर को देखते हैं
ग़ालिब
यक-ज़र्रा-ए-ज़मीं नहीं बे-कार बाग़ का
ग़ालिब
याद है शादी में भी हंगामा-ए-या-रब मुझे
ग़ालिब
वुसअत-ए-सई-ए-करम देख कि सर-ता-सर-ए-ख़ाक
ग़ालिब
वो मिरी चीन-ए-जबीं से ग़म-ए-पिन्हाँ समझा
ग़ालिब
वो फ़िराक़ और वो विसाल कहाँ
ग़ालिब
वारस्ता उस से हैं कि मोहब्बत ही क्यूँ न हो
ग़ालिब
वाँ पहुँच कर जो ग़श आता पए-हम है हम को
ग़ालिब
तुम जानो तुम को ग़ैर से जो रस्म-ओ-राह हो
ग़ालिब
तुम अपने शिकवे की बातें न खोद खोद के पूछो
ग़ालिब
तेरे तौसन को सबा बाँधते हैं
ग़ालिब
तस्कीं को हम न रोएँ जो ज़ौक़-ए-नज़र मिले
ग़ालिब
तपिश से मेरी वक़्फ़-ए-कशमकश हर तार-ए-बिस्तर है
ग़ालिब
सुर्मा-ए-मुफ़्त-ए-नज़र हूँ मिरी क़ीमत ये है
ग़ालिब
सियाही जैसे गिर जाए दम-ए-तहरीर काग़ज़ पर
ग़ालिब
सीमाब-पुश्त गर्मी-ए-आईना दे है हम
ग़ालिब
शिकवे के नाम से बे-मेहर ख़फ़ा होता है
ग़ालिब
शौक़ हर रंग रक़ीब-ए-सर-ओ-सामाँ निकला
ग़ालिब
शबनम ब-गुल-ए-लाला न ख़ाली ज़-अदा है
ग़ालिब
शब कि वो मजलिस-फ़रोज़-ए-ख़ल्वत-ए-नामूस था
ग़ालिब