Sad Poetry (page 93)
तुम्हारे दर से उठाए गए मलाल नहीं
ग़ालिब अयाज़
फिर यही रुत हो ऐन मुमकिन है
ग़ालिब अयाज़
कभी गुमान कभी ए'तिबार बन के रहा
ग़ालिब अयाज़
जबीन-ए-शौक़ पे गर्द-ए-मलाल चाहती है
ग़ालिब अयाज़
हुस्न के ज़ेर-ए-बार हो कि न हो
ग़ालिब अयाज़
हुआ करेगा हर इक लफ़्ज़ मुश्क-बार अपना
ग़ालिब अयाज़
हवा के होंट खुलें साअत-ए-कलाम तो आए
ग़ालिब अयाज़
दर्द जब दस्तरस-ए-चारागराँ से निकला
ग़ालिब अयाज़
सदा ब-सहरा
ग़ालिब अहमद
ज़िंदगी अपनी जब इस शक्ल से गुज़री 'ग़ालिब'
ग़ालिब
ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार होता
ग़ालिब
ये कहाँ की दोस्ती है कि बने हैं दोस्त नासेह
ग़ालिब
ये हम जो हिज्र में दीवार-ओ-दर को देखते हैं
ग़ालिब
तंगी-ए-दिल का गिला क्या ये वो काफ़िर-दिल है
ग़ालिब
ता फिर न इंतिज़ार में नींद आए उम्र भर
ग़ालिब
शोरीदगी के हाथ से है सर वबाल-ए-दोश
ग़ालिब
रंज से ख़ूगर हुआ इंसाँ तो मिट जाता है रंज
ग़ालिब
रखियो 'ग़ालिब' मुझे इस तल्ख़-नवाई में मुआफ़
ग़ालिब
क़ैद-ए-हयात ओ बंद-ए-ग़म अस्ल में दोनों एक हैं
ग़ालिब
फूँका है किस ने गोश-ए-मोहब्बत में ऐ ख़ुदा
ग़ालिब
फिर मुझे दीदा-ए-तर याद आया
ग़ालिब
नींद उस की है दिमाग़ उस का है रातें उस की हैं
ग़ालिब
ने तीर कमाँ में है न सय्याद कमीं में
ग़ालिब
मिसाल ये मिरी कोशिश की है कि मुर्ग़-ए-असीर
ग़ालिब
मेरी क़िस्मत में ग़म गर इतना था
ग़ालिब
मौत का एक दिन मुअय्यन है
ग़ालिब
मरते हैं आरज़ू में मरने की
ग़ालिब
मैं ने मजनूँ पे लड़कपन में 'असद'
ग़ालिब
मैं भी रुक रुक के न मरता जो ज़बाँ के बदले
ग़ालिब
लेता हूँ मकतब-ए-ग़म-ए-दिल में सबक़ हुनूज़
ग़ालिब