Sad Poetry (page 94)

लाज़िम था कि देखो मिरा रस्ता कोई दिन और

ग़ालिब

क्या ख़ूब तुम ने ग़ैर को बोसा नहीं दिया

ग़ालिब

कोई वीरानी सी वीरानी है

ग़ालिब

काव काव-ए-सख़्त-जानी हाए-तन्हाई न पूछ

ग़ालिब

कहूँ किस से मैं कि क्या है शब-ए-ग़म बुरी बला है

ग़ालिब

कहते हुए साक़ी से हया आती है वर्ना

ग़ालिब

कभी नेकी भी उस के जी में गर आ जाए है मुझ से

ग़ालिब

जब मय-कदा छुटा तो फिर अब क्या जगह की क़ैद

ग़ालिब

इशरत-ए-क़तरा है दरिया में फ़ना हो जाना

ग़ालिब

इश्क़ से तबीअत ने ज़ीस्त का मज़ा पाया

ग़ालिब

हुई मुद्दत कि 'ग़ालिब' मर गया पर याद आता है

ग़ालिब

हवस को है नशात-ए-कार क्या क्या

ग़ालिब

हैराँ हूँ दिल को रोऊँ कि पीटूँ जिगर को मैं

ग़ालिब

है कुछ ऐसी ही बात जो चुप हूँ

ग़ालिब

है कहाँ तमन्ना का दूसरा क़दम या रब

ग़ालिब

है अब इस मामूरे में क़हत-ए-ग़म-ए-उल्फ़त 'असद'

ग़ालिब

घर में था क्या कि तिरा ग़म उसे ग़ारत करता

ग़ालिब

ग़म-ए-हस्ती का 'असद' किस से हो जुज़ मर्ग इलाज

ग़ालिब

ग़म अगरचे जाँ-गुसिल है प कहाँ बचें कि दिल है

ग़ालिब

'ग़ालिब'-ए-ख़स्ता के बग़ैर कौन से काम बंद हैं

ग़ालिब

गर किया नासेह ने हम को क़ैद अच्छा यूँ सही

ग़ालिब

ए'तिबार-ए-इश्क़ की ख़ाना-ख़राबी देखना

ग़ालिब

एक हंगामे पे मौक़ूफ़ है घर की रौनक़

ग़ालिब

दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है

ग़ालिब

दिल में ज़ौक़-ए-वस्ल ओ याद-ए-यार तक बाक़ी नहीं

ग़ालिब

दिल ही तो है न संग-ओ-ख़िश्त दर्द से भर न आए क्यूँ

ग़ालिब

दर्द मिन्नत-कश-ए-दवा न हुआ

ग़ालिब

दम लिया था न क़यामत ने हनूज़

ग़ालिब

बू-ए-गुल नाला-ए-दिल दूद-ए-चराग़-ए-महफ़िल

ग़ालिब

अल्लाह रे ज़ौक़-ए-दश्त-नवर्दी कि बाद-ए-मर्ग

ग़ालिब