Sufi Poetry (page 5)
जिस में हो याद भी तिरी शामिल
फ़िराक़ गोरखपुरी
शाम-ए-अयादत
फ़िराक़ गोरखपुरी
हिण्डोला
फ़िराक़ गोरखपुरी
ज़िंदगी दर्द की कहानी है
फ़िराक़ गोरखपुरी
वो चुप-चाप आँसू बहाने की रातें
फ़िराक़ गोरखपुरी
तूर था का'बा था दिल था जल्वा-ज़ार-ए-यार था
फ़िराक़ गोरखपुरी
तेज़ एहसास-ए-ख़ुदी दरकार है
फ़िराक़ गोरखपुरी
शाम-ए-ग़म कुछ उस निगाह-ए-नाज़ की बातें करो
फ़िराक़ गोरखपुरी
मय-कदे में आज इक दुनिया को इज़्न-ए-आम था
फ़िराक़ गोरखपुरी
हो के सर-ता-ब-क़दम आलम-ए-असरार चला
फ़िराक़ गोरखपुरी
हाथ आए तो वही दामन-ए-जानाँ हो जाए
फ़िराक़ गोरखपुरी
इक रोज़ हुए थे कुछ इशारात ख़फ़ी से
फ़िराक़ गोरखपुरी
बहसें छिड़ी हुई हैं हयात-ओ-ममात की
फ़िराक़ गोरखपुरी
अब दौर-ए-आसमाँ है न दौर-ए-हयात है
फ़िराक़ गोरखपुरी
आई है कुछ न पूछ क़यामत कहाँ कहाँ
फ़िराक़ गोरखपुरी
शोहरत-ए-तर्ज़-ए-फ़ुग़ाँ आम हुई जाती है
फ़िगार उन्नावी
वही रिवायत गज़ीदा-दानिश वही हिकायत किताब वाली
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
हाथ फैलाओ तो सूरज भी सियाही देगा
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
तमाशा फिर सर-ए-बाज़ार करना
फ़य्याज़ तहसीन
दिन गुज़र जाएगा
फर्रुख यार
था अबस ख़ौफ़ कि आसेब-ए-गुमाँ मैं ही था
फ़र्रुख़ जाफ़री
ब-रोज़-ए-हश्र मिरे साथ दिल-लगी ही तो है
फ़ारूक़ बाँसपारी
रंग-दर-रंग हिजाबात उठाने होंगे
फ़ारिग़ बुख़ारी
ख़िरद भी ना-मेहरबाँ रहेगी शुऊ'र भी सर-गराँ रहेगा
फ़ारिग़ बुख़ारी
वो बहकी निगाहें क्या कहिए वो महकी जवानी क्या कहिए
फ़रहत कानपुरी
कुछ तो वुफ़ूर-ए-शौक़ में बाइ'स-ए-इम्तियाज़ हो
फ़रहत कानपुरी
काम उन आँखों की हवसनाकी की साज़िश आ गई
फ़रहत एहसास
तक़ाज़ा
फ़रीद इशरती
ऐ बे-ख़ुदी ठहर कि बहुत दिन गुज़र गए
फ़ानी बदायुनी
वादी-ए-शौक़ में वारफ़्ता-ए-रफ़्तार हैं हम
फ़ानी बदायुनी