Couplets Poetry (page 326)
मौसम सूखा सूखा सा था लेकिन ये क्या बात हुई
इमाम अाज़म
किसी की बात कोई बद-गुमाँ न समझेगा
इमाम अाज़म
जो मज़े आज तिरे ग़म के अज़ाबों में मिले
इमाम अाज़म
हर तरफ़ इक जंग का माहौल है 'आज़म' यहाँ
इमाम अाज़म
गेसू ओ रुख़्सार की बातें करें
इमाम अाज़म
दुनिया की इक रीत पुरानी, मिलना और बिछड़ना है
इमाम अाज़म
आस्था का रंग आ जाए अगर माहौल में
इमाम अाज़म
वक़्त आया तो ख़ून से अपने दाग़-ए-नदामत धो लेंगे
इलियास इश्क़ी
वही आग अपना नसीब थी कि तमाम उम्र जला किए
इलियास इश्क़ी
कोई क़र्या कोई दयार हो कहीं हम अकेले नहीं रहे
इलियास इश्क़ी
इस उलझन को सुलझाने की कौन सी है तदबीर लिखो
इलियास इश्क़ी
आज की शाम गुज़ारेंगे हम छतरी में
इलियास बाबर आवान
पहले दरवाज़े पे दस्तक दे लूँ
इकराम तबस्सुम
किस क़दर गुनाहों के मुर्तकिब हुए हैं हम
इकराम मुजीब
कम ज़रा न होने दी एक लफ़्ज़ की हुरमत
इकराम मुजीब
इस हसीन मंज़र से दुख कई उभरने हैं
इकराम मुजीब
हिज्र की मसाफ़त में साथ तू रहा हर दम
इकराम मुजीब
एक दर्द की लज़्ज़त बरक़रार रखने को
इकराम मुजीब
ज़बाँ से दिल का फ़साना अदा किया न गया
इज्तिबा रिज़वी
मिरे साज़-ए-नफ़स की ख़ामुशी पर रूह कहती है
इज्तिबा रिज़वी
ख़िरद को ख़ाना-ए-दिल का निगह-बाँ कर दिया हम ने
इज्तिबा रिज़वी
चुराने को चुरा लाया मैं जल्वे रू-ए-रौशन से
इज्तिबा रिज़वी
अफ़्सुर्दगी भी हुस्न है ताबिंदगी भी हुस्न
इज्तिबा रिज़वी
था कोई वहाँ जो है यहाँ भी है वहाँ भी
इफ्तिखार शफ़ी
हिजरत की घड़ी हम ने तिरे ख़त के अलावा
इफ्तिखार शफ़ी
ये वस्ल की रुत है कि जुदाई का है मौसम
इफ़्तिख़ार राग़िब
वो कहते हैं कि 'राग़िब' तुम नहीं रखते ख़याल अपना
इफ़्तिख़ार राग़िब
तुम ने रस्मन मुझे सलाम किया
इफ़्तिख़ार राग़िब
तक़दीर-ए-वफ़ा का फूट जाना
इफ़्तिख़ार राग़िब
सख़्त-जानी की बदौलत अब भी हम हैं ताज़ा-दम
इफ़्तिख़ार राग़िब