Couplets Poetry (page 327)
'राग़िब' वो मेरी फ़िक्र में ख़ुद को भी भूल जाएँ
इफ़्तिख़ार राग़िब
राय उस पर मत करो क़ाएम कोई
इफ़्तिख़ार राग़िब
पढ़ता रहता हूँ आप का चेहरा
इफ़्तिख़ार राग़िब
ले जाए जहाँ चाहे हवा हम को उड़ा कर
इफ़्तिख़ार राग़िब
क्या बताऊँ कि कितनी शिद्दत से
इफ़्तिख़ार राग़िब
क्या बताऊँ दिल में किस की याद का
इफ़्तिख़ार राग़िब
किस किस को बताऊँ कि मैं बुज़दिल नहीं 'राग़िब'
इफ़्तिख़ार राग़िब
जी चाहता है जीना जज़्बात के मुताबिक़
इफ़्तिख़ार राग़िब
इस शोख़ी-ए-गुफ़्तार पर आता है बहुत प्यार
इफ़्तिख़ार राग़िब
इंकार ही कर दीजिए इक़रार नहीं तो
इफ़्तिख़ार राग़िब
एक मौसम की कसक है दिल में दफ़्न
इफ़्तिख़ार राग़िब
इक बड़ी जंग लड़ रहा हूँ मैं
इफ़्तिख़ार राग़िब
दिन में आने लगे हैं ख़्वाब मुझे
इफ़्तिख़ार राग़िब
दिल में कुछ भी तो न रह जाएगा
इफ़्तिख़ार राग़िब
चंद यादें हैं चंद सपने हैं
इफ़्तिख़ार राग़िब
बे-सबब 'राग़िब' तड़प उठता है दिल
इफ़्तिख़ार राग़िब
सारे दरिया फूट पड़ेंगे इक दूजे के बीच
इफ़्तिख़ार क़ैसर
मिरे चेहरे को चेहरा कब इनायत कर रहे हो
इफ़्तिख़ार क़ैसर
इस क़दर बढ़ने लगे हैं घर से घर के फ़ासले
इफ़्तिख़ार क़ैसर
बे-घर होना बे-घर रहना सब अच्छा ठहरा
इफ़्तिख़ार क़ैसर
ये कौन मुझ को अधूरा बना के छोड़ गया
इफ़्तिख़ार नसीम
उस के चेहरे की चमक के सामने सादा लगा
इफ़्तिख़ार नसीम
तू तो उन का भी गिला करता है जो तेरे न थे
इफ़्तिख़ार नसीम
तिरा है काम कमाँ में उसे लगाने तक
इफ़्तिख़ार नसीम
ताक़ पर जुज़दान में लिपटी दुआएँ रह गईं
इफ़्तिख़ार नसीम
न जाने कब वो पलट आएँ दर खुला रखना
इफ़्तिख़ार नसीम
न हो कि क़ुर्ब ही फिर मर्ग-ए-रब्त बन जाए
इफ़्तिख़ार नसीम
मुझ से नफ़रत है अगर उस को तो इज़हार करे
इफ़्तिख़ार नसीम
मैं शीशा क्यूँ न बना आदमी हुआ क्यूँकर
इफ़्तिख़ार नसीम
कोई बादल मेरे तपते जिस्म पर बरसा नहीं
इफ़्तिख़ार नसीम