Couplets Poetry (page 329)

दर्द की सारी तहें और सारे गुज़रे हादसे

इफ़्तिख़ार इमाम सिद्दीक़ी

दश्त-ए-बे-सम्त में रुकना भी सफ़र ऐसा था

इफ़्तिख़ार बुख़ारी

ज़िंदगी भर की कमाई यही मिसरे दो-चार

इफ़्तिख़ार आरिफ़

ज़माना हो गया ख़ुद से मुझे लड़ते-झगड़ते

इफ़्तिख़ार आरिफ़

ये वक़्त किस की रऊनत पे ख़ाक डाल गया

इफ़्तिख़ार आरिफ़

ये तेरे मेरे चराग़ों की ज़िद जहाँ से चली

इफ़्तिख़ार आरिफ़

ये सारी जन्नतें ये जहन्नम अज़ाब ओ अज्र

इफ़्तिख़ार आरिफ़

ये रौशनी के तआक़ुब में भागता हुआ दिन

इफ़्तिख़ार आरिफ़

ये मोजज़ा भी किसी की दुआ का लगता है

इफ़्तिख़ार आरिफ़

ये बस्तियाँ हैं कि मक़्तल दुआ किए जाएँ

इफ़्तिख़ार आरिफ़

ये बस्ती जानी पहचानी बहुत है

इफ़्तिख़ार आरिफ़

यही लौ थी कि उलझती रही हर रात के साथ

इफ़्तिख़ार आरिफ़

यही लहजा था कि मेआर-ए-सुख़न ठहरा था

इफ़्तिख़ार आरिफ़

वो मेरे नाम की निस्बत से मो'तबर ठहरे

इफ़्तिख़ार आरिफ़

वो क्या मंज़िल जहाँ से रास्ते आगे निकल जाएँ

इफ़्तिख़ार आरिफ़

वो जिस के नाम की निस्बत से रौशनी था वजूद

इफ़्तिख़ार आरिफ़

वो हम नहीं थे तो फिर कौन था सर-ए-बाज़ार

इफ़्तिख़ार आरिफ़

वही है ख़्वाब जिसे मिल के सब ने देखा था

इफ़्तिख़ार आरिफ़

वही फ़िराक़ की बातें वही हिकायत-ए-वस्ल

इफ़्तिख़ार आरिफ़

वही चराग़ बुझा जिस की लौ क़यामत थी

इफ़्तिख़ार आरिफ़

वफ़ा की ख़ैर मनाता हूँ बेवफ़ाई में भी

इफ़्तिख़ार आरिफ़

वफ़ा के बाब में कार-ए-सुख़न तमाम हुआ

इफ़्तिख़ार आरिफ़

उसी को बात न पहुँचे जिसे पहुँचनी हो

इफ़्तिख़ार आरिफ़

उमीद-ओ-बीम के मेहवर से हट के देखते हैं

इफ़्तिख़ार आरिफ़

तुम से बिछड़ कर ज़िंदा हैं

इफ़्तिख़ार आरिफ़

तमाशा करने वालों को ख़बर दी जा चुकी है

इफ़्तिख़ार आरिफ़

तमाम ख़ाना-ब-दोशों में मुश्तरक है ये बात

इफ़्तिख़ार आरिफ़

सुब्ह सवेरे रन पड़ना है और घमसान का रन

इफ़्तिख़ार आरिफ़

सितारों से भरा ये आसमाँ कैसा लगेगा

इफ़्तिख़ार आरिफ़

सिपाह-ए-शाम के नेज़े पे आफ़्ताब का सर

इफ़्तिख़ार आरिफ़