Couplets Poetry (page 331)
ख़ुद को बिखरते देखते हैं कुछ कर नहीं पाते हैं
इफ़्तिख़ार आरिफ़
खज़ाना-ए-ज़र-ओ-गौहर पे ख़ाक डाल के रख
इफ़्तिख़ार आरिफ़
ख़ाक में दौलत-ए-पिंदार-ओ-अना मिलती है
इफ़्तिख़ार आरिफ़
कारोबार में अब के ख़सारा और तरह का है
इफ़्तिख़ार आरिफ़
करें तो किस से करें ना-रसाइयों का गिला
इफ़्तिख़ार आरिफ़
कहीं कहीं से कुछ मिसरे एक-आध ग़ज़ल कुछ शेर
इफ़्तिख़ार आरिफ़
कहानी में नए किरदार शामिल हो गए हैं
इफ़्तिख़ार आरिफ़
कहाँ के नाम ओ नसब इल्म क्या फ़ज़ीलत क्या
इफ़्तिख़ार आरिफ़
जो हर्फ़-ए-हक़ की हिमायत में हो वो गुम-नामी
इफ़्तिख़ार आरिफ़
जो डूबती जाती है वो कश्ती भी है मेरी
इफ़्तिख़ार आरिफ़
जवाब आए न आए सवाल उठा तो सही
इफ़्तिख़ार आरिफ़
जब 'मीर' ओ 'मीरज़ा' के सुख़न राएगाँ गए
इफ़्तिख़ार आरिफ़
इस बार भी दुनिया ने हदफ़ हम को बनाया
इफ़्तिख़ार आरिफ़
हम भी इक शाम बहुत उलझे हुए थे ख़ुद में
इफ़्तिख़ार आरिफ़
हम अपने रफ़्तगाँ को याद रखना चाहते हैं
इफ़्तिख़ार आरिफ़
हुआ है यूँ भी कि इक उम्र अपने घर न गए
इफ़्तिख़ार आरिफ़
हर नई नस्ल को इक ताज़ा मदीने की तलाश
इफ़्तिख़ार आरिफ़
हर इक से पूछते फिरते हैं तेरे ख़ाना-ब-दोश
इफ़्तिख़ार आरिफ़
हमीं में रहते हैं वो लोग भी कि जिन के सबब
इफ़्तिख़ार आरिफ़
हामी भी न थे मुंकिर-ए-'ग़ालिब' भी नहीं थे
इफ़्तिख़ार आरिफ़
हमें तो अपने समुंदर की रेत काफ़ी है
इफ़्तिख़ार आरिफ़
हमें भी आफ़ियत-ए-जाँ का है ख़याल बहुत
इफ़्तिख़ार आरिफ़
घर से निकले हुए बेटों का मुक़द्दर मालूम
इफ़्तिख़ार आरिफ़
घर की वहशत से लरज़ता हूँ मगर जाने क्यूँ
इफ़्तिख़ार आरिफ़
ग़म-ए-जहाँ को शर्मसार करने वाले क्या हुए
इफ़्तिख़ार आरिफ़
इक ख़्वाब ही तो था जो फ़रामोश हो गया
इफ़्तिख़ार आरिफ़
एक हम ही तो नहीं हैं जो उठाते हैं सवाल
इफ़्तिख़ार आरिफ़
एक चराग़ और एक किताब और एक उम्मीद असासा
इफ़्तिख़ार आरिफ़
दुनिया बदल रही है ज़माने के साथ साथ
इफ़्तिख़ार आरिफ़
डूब जाऊँ तो कोई मौज निशाँ तक न बताए
इफ़्तिख़ार आरिफ़