Couplets Poetry (page 332)

दुआएँ याद करा दी गई थीं बचपन में

इफ़्तिख़ार आरिफ़

दुआ को हात उठाते हुए लरज़ता हूँ

इफ़्तिख़ार आरिफ़

दिल उन के साथ मगर तेग़ और शख़्स के साथ

इफ़्तिख़ार आरिफ़

दिल पागल है रोज़ नई नादानी करता है

इफ़्तिख़ार आरिफ़

दिल के माबूद जबीनों के ख़ुदाई से अलग

इफ़्तिख़ार आरिफ़

दिल कभी ख़्वाब के पीछे कभी दुनिया की तरफ़

इफ़्तिख़ार आरिफ़

दयार-ए-नूर में तीरा-शबों का साथी हो

इफ़्तिख़ार आरिफ़

दर-ओ-दीवार इतने अजनबी क्यूँ लग रहे हैं

इफ़्तिख़ार आरिफ़

बुलंद हाथों में ज़ंजीर डाल देते हैं

इफ़्तिख़ार आरिफ़

बेटियाँ बाप की आँखों में छुपे ख़्वाब को पहचानती हैं

इफ़्तिख़ार आरिफ़

बस एक ख़्वाब की सूरत कहीं है घर मेरा

इफ़्तिख़ार आरिफ़

बहुत मुश्किल ज़मानों में भी हम अहल-ए-मोहब्बत

इफ़्तिख़ार आरिफ़

अज़ाब-ए-वहशत-ए-जाँ का सिला न माँगे कोई

इफ़्तिख़ार आरिफ़

अज़ाब ये भी किसी और पर नहीं आया

इफ़्तिख़ार आरिफ़

अजीब ही था मिरे दौर-ए-गुमरही का रफ़ीक़

इफ़्तिख़ार आरिफ़

अजब तरह का है मौसम कि ख़ाक उड़ती है

इफ़्तिख़ार आरिफ़

अब भी तौहीन-ए-इताअत नहीं होगी हम से

इफ़्तिख़ार आरिफ़

शोर-ए-दरिया-ए-वफ़ा इशरत-ए-साहिल के क़रीब

इफ़्तिख़ार आज़मी

कितना सुनसान है रस्ता दिल का

इफ़्तिख़ार आज़मी

हुस्न यूँ इश्क़ से नाराज़ है अब

इफ़्तिख़ार आज़मी

अजब तनाव है माहौल में कहें किस से

इफ़्तिख़ार आज़मी

ज़ेहन ओ दिल के फ़ासले थे हम जिन्हें सहते रहे

इफ़्फ़त ज़र्रीं

वो मुझ को भूल चुका अब यक़ीन है वर्ना

इफ़्फ़त ज़र्रीं

वो मिल गया तो बिछड़ना पड़ेगा फिर 'ज़र्रीं'

इफ़्फ़त ज़र्रीं

पत्थर के जिस्म मोम के चेहरे धुआँ धुआँ

इफ़्फ़त ज़र्रीं

कौन पहचानेगा 'ज़र्रीं' मुझ को इतनी भीड़ में

इफ़्फ़त ज़र्रीं

देख कर इंसान की बेचारगी

इफ़्फ़त ज़र्रीं

अगर वो चाँद की बस्ती का रहने वाला था

इफ़्फ़त ज़र्रीं

ये किरन कहीं मिरे दिल में आग लगा न दे

इदरीस बाबर

यहाँ से चारों तरफ़ रास्ते निकलते हैं

इदरीस बाबर