Couplets Poetry (page 334)

ज़िंदगी कम पढ़े परदेसी का ख़त है 'इबरत'

इबरत मछलीशहरी

ज़मीं के जिस्म को टुकड़ों में बाँटने वालो

इबरत मछलीशहरी

वो यूँ सुबूत-ए-उरूज-ओ-ज़वाल देता था

इबरत मछलीशहरी

सुना है डूब गई बे-हिसी के दरिया में

इबरत मछलीशहरी

क्यूँ पशेमाँ हो अगर वअ'दा वफ़ा हो न सका

इबरत मछलीशहरी

जब आ जाती है दुनिया घूम फिर कर अपने मरकज़ पर

इबरत मछलीशहरी

अपनी ग़ुर्बत की कहानी हम सुनाएँ किस तरह

इबरत मछलीशहरी

ज़िंदगी वादी ओ सहरा का सफ़र है क्यूँ है

इब्राहीम अश्क

ज़िंदगी अपनी मुसलसल चाहतों का इक सफ़र

इब्राहीम अश्क

ये और बात है कि बरहना थी ज़िंदगी

इब्राहीम अश्क

थी हौसले की बात ज़माने में ज़िंदगी

इब्राहीम अश्क

तिरी ज़मीं से उठेंगे तो आसमाँ होंगे

इब्राहीम अश्क

नाम को भी न किसी आँख से आँसू निकला

इब्राहीम अश्क

नहीं है तुम में सलीक़ा जो घर बनाने का

इब्राहीम अश्क

न दिल में कोई ग़म रहे न मेरी आँख नम रहे

इब्राहीम अश्क

मुझे न देखो मिरे जिस्म का धुआँ देखो

इब्राहीम अश्क

कोई तो होगा जिस को मिरा इंतिज़ार है

इब्राहीम अश्क

कोई भरोसा नहीं अब्र के बरसने का

इब्राहीम अश्क

किस लिए कतरा के जाता है मुसाफ़िर दम तो ले

इब्राहीम अश्क

ख़ुद अपने आप से लेना था इंतिक़ाम मुझे

इब्राहीम अश्क

करें सलाम उसे तो कोई जवाब न दे

इब्राहीम अश्क

दुनिया बहुत क़रीब से उठ कर चली गई

इब्राहीम अश्क

चले गए तो पुकारेगी हर सदा हम को

इब्राहीम अश्क

बिखरे हुए थे लोग ख़ुद अपने वजूद में

इब्राहीम अश्क

बस एक बार ही तोड़ा जहाँ ने अहद-ए-वफ़ा

इब्राहीम अश्क

यादों ने ले लिया मुझे अपने हिसार में

इब्राहीम होश

तय कर के दिल का ज़ीना वो इक क़तरा ख़ून का

इब्राहीम होश

रोते रोते मिरे हँसने पे तअज्जुब न करो

इब्राहीम होश

मिरी नज़र में है अंजाम इस तआक़ुब का

इब्राहीम होश

लफ़्ज़ों से बना इंसाँ लफ़्ज़ों ही में रहता है

इब्राहीम होश