Couplets Poetry (page 336)

वहशत-ए-दिल के ख़रीदार भी नापैद हुए

इब्न-ए-इंशा

सुन तो लिया किसी नार की ख़ातिर काटा कोह निकाली नहर

इब्न-ए-इंशा

रात आ कर गुज़र भी जाती है

इब्न-ए-इंशा

'मीर' से बैअत की है तो 'इंशा' मीर की बैअत भी है ज़रूर

इब्न-ए-इंशा

कुछ कहने का वक़्त नहीं ये कुछ न कहो ख़ामोश रहो

इब्न-ए-इंशा

कूचे को तेरे छोड़ कर जोगी ही बन जाएँ मगर

इब्न-ए-इंशा

कल चौदहवीं की रात थी शब भर रहा चर्चा तिरा

इब्न-ए-इंशा

कब लौटा है बहता पानी बिछड़ा साजन रूठा दोस्त

इब्न-ए-इंशा

जल्वा-नुमाई बेपरवाई हाँ यही रीत जहाँ की है

इब्न-ए-इंशा

जब शहर के लोग न रस्ता दें क्यूँ बन में न जा बिसराम करे

इब्न-ए-इंशा

इस शहर में किस से मिलें हम से तो छूटीं महफ़िलें

इब्न-ए-इंशा

'इंशा'-जी उठो अब कूच करो इस शहर में जी को लगाना क्या

इब्न-ए-इंशा

हुस्न सब को ख़ुदा नहीं देता

इब्न-ए-इंशा

हम किसी दर पे न ठिटके न कहीं दस्तक दी

इब्न-ए-इंशा

हम भूल सके हैं न तुझे भूल सकेंगे

इब्न-ए-इंशा

हक़ अच्छा पर उस के लिए कोई और मिरे तो और अच्छा

इब्न-ए-इंशा

गर्म आँसू और ठंडी आहें मन में क्या क्या मौसम हैं

इब्न-ए-इंशा

एक से एक जुनूँ का मारा इस बस्ती में रहता है

इब्न-ए-इंशा

इक साल गया इक साल नया है आने को

इब्न-ए-इंशा

एक दिन देखने को आ जाते

इब्न-ए-इंशा

दिल हिज्र के दर्द से बोझल है अब आन मिलो तो बेहतर हो

इब्न-ए-इंशा

दीदा ओ दिल ने दर्द की अपने बात भी की तो किस से की

इब्न-ए-इंशा

बेकल बेकल रहते हो पर महफ़िल के आदाब के साथ

इब्न-ए-इंशा

बे तेरे क्या वहशत हम को तुझ बिन कैसा सब्र ओ सुकूँ

इब्न-ए-इंशा

अपनी ज़बाँ से कुछ न कहेंगे चुप ही रहेंगे आशिक़ लोग

इब्न-ए-इंशा

अपने हमराह जो आते हो इधर से पहले

इब्न-ए-इंशा

अहल-ए-वफ़ा से तर्क-ए-तअल्लुक़ कर लो पर इक बात कहें

इब्न-ए-इंशा

आन के इस बीमार को देखे तुझ को भी तौफ़ीक़ हुई

इब्न-ए-इंशा

केक बिस्कुट खाएँगे उल्लू-के-पट्ठे रात दिन

हुसैन मीर काश्मीरी

उस का चेहरा उदास है 'माजिद'

हुसैन माजिद