Couplets Poetry (page 337)

'माजिद' ख़ुदा के वास्ते कुछ देर के लिए

हुसैन माजिद

कल जो मैं ने झाँक के देखा उस की नीली आँखों में

हुसैन माजिद

कहने की तो बात नहीं है लेकिन कहनी पड़ती है

हुसैन माजिद

वो लम्हा जब मिरे बच्चे ने माँ पुकारा मुझे

हुमैरा रहमान

मिरी अलमारियों में क़ीमती सामान काफ़ी था

हुमैरा रहमान

लोगो! हम परदेसी हो कर जाने क्या क्या खो बैठे

हुमैरा रहमान

कंकर फेंक रहे हैं ये अंदाज़ा करने को

हुमैरा रहमान

हम और तुम जो बदल गए तो इतनी हैरत क्या

हुमैरा रहमान

हवा की तेज़-गामियों का इंकिशाफ़ क्या करें

हुमैरा रहमान

गुज़शता मौसमों में बुझ गए हैं रंग फूलों के

हुमैरा रहमान

अजब मज़ाक़ उस का था कि सर से पाँव तक मुझे

हुमैरा रहमान

ज़िक्र सुनती हूँ उजाले का बहुत

हुमैरा राहत

ये किस की याद की बारिश में भीगता है बदन

हुमैरा राहत

वो मुझ को आज़माता ही रहा है ज़िंदगी भर

हुमैरा राहत

वो इश्क़ को किस तरह समझ पाएगा जिस ने

हुमैरा राहत

वो और थे कि जो ना-ख़ुश थे दो जहाँ ले कर

हुमैरा राहत

उसे भी ज़िंदगी करनी पड़ेगी 'मीर' जैसी

हुमैरा राहत

तअल्लुक़ की नई इक रस्म अब ईजाद करना है

हुमैरा राहत

सुना है ख़्वाब मुकम्मल कभी नहीं होते

हुमैरा राहत

न हम से इश्क़ का मफ़्हूम पूछो

हुमैरा राहत

मिरे दिल के अकेले घर में 'राहत'

हुमैरा राहत

ख़ुशी मेरी गवारा थी न क़िस्मत को न दुनिया को

हुमैरा राहत

कभी कभी तो जुदा बे-सबब भी होते हैं

हुमैरा राहत

जो मंज़िल तक जा के और कहीं मुड़ जाए

हुमैरा राहत

जहाँ इक शख़्स भी मिलता नहीं है चाहने से

हुमैरा राहत

हुज़ूर आप कोई फ़ैसला करें तो सही

हुमैरा राहत

गुज़र जाएगी सारी रात इस में

हुमैरा राहत

बना कर एक घर दिल की ज़मीं पर उस की यादों का

हुमैरा राहत

बहुत ताख़ीर से पाया है ख़ुद को

हुमैरा राहत

तज़ईन-ए-बज़्म-ए-ग़म के लिए कोई शय तो हो

होश तिर्मिज़ी