Couplets Poetry (page 339)
बदन पे पैरहन-ए-ख़ाक के सिवा क्या है
हिमायत अली शाएर
अपने किसी अमल पे नदामत नहीं मुझे
हिमायत अली शाएर
अब न कोई मंज़िल है और न रहगुज़र कोई
हिमायत अली शाएर
उस अजनबी से वास्ता ज़रूर था कोई
हिलाल फ़रीद
पानी पे बनते अक्स की मानिंद हूँ मगर
हिलाल फ़रीद
पहले भी जहाँ पर बिछड़े थे वही मंज़िल थी इस बार मगर
हिलाल फ़रीद
न ही बिजलियाँ न ही बारिशें न ही दुश्मनों की वो साज़िशें
हिलाल फ़रीद
मिरी दास्ताँ भी अजीब है वो क़दम क़दम मिरे साथ था
हिलाल फ़रीद
जाम-ए-इश्क़ पी चुके ज़िंदगी भी जी चुके
हिलाल फ़रीद
जब वक़्त पड़ा था तो जो कुछ हम ने किया था
हिलाल फ़रीद
इस अक़्ल की मारी नगरी में कभी पानी आग नहीं बनता
हिलाल फ़रीद
हम ख़ुद भी हुए नादिम जब हर्फ़-ए-दुआ निकला
हिलाल फ़रीद
बाहर जो नहीं था तो कोई बात नहीं थी
हिलाल फ़रीद
अपने दुख में रोना-धोना आप ही आया
हिलाल फ़रीद
आज फिर दब गईं दर्द की सिसकियाँ
हिलाल फ़रीद
आज न हम से पूछिए कैसा कमाल हो गया
हिलाल फ़रीद
शब-ए-फ़िराक़ कुछ ऐसा ख़याल-ए-यार रहा
हिज्र नाज़िम अली ख़ान
न दर्द था न ख़लिश थी न तिलमिलाना था
हिज्र नाज़िम अली ख़ान
मुझे वो याद करते हैं ये कह कर
हिज्र नाज़िम अली ख़ान
क्या रश्क है कि एक का है एक मुद्दई
हिज्र नाज़िम अली ख़ान
कुछ ख़बर है तुझे ओ चैन से सोने वाले
हिज्र नाज़िम अली ख़ान
कहेगी हश्र के दिन उस की रहमत-ए-बे-हद
हिज्र नाज़िम अली ख़ान
कभी ये फ़िक्र कि वो याद क्यूँ करेंगे हमें
हिज्र नाज़िम अली ख़ान
हज़ार रंज हैं अब ये भी इक ज़माना है
हिज्र नाज़िम अली ख़ान
अक्स से अपने वो यूँ कहते हैं आईने में
हिज्र नाज़िम अली ख़ान
ऐ हिज्र वक़्त टल नहीं सकता है मौत का
हिज्र नाज़िम अली ख़ान
आया भी कोई दिल में गया भी कोई दिल से
हिज्र नाज़िम अली ख़ान
हम इस शहर-ए-जफ़ा-पेशा से कुछ उम्मीद क्या रक्खें
हिजाब अब्बासी
है जब तक दश्त-पैमाई सलामत
हिजाब अब्बासी
दुआ ही वज्ह-ए-करामात थोड़ी होती है
हिजाब अब्बासी