Couplets Poetry (page 338)
मिलने को है खमोशी-ए-अहल-ए-जुनूँ की दाद
होश तिर्मिज़ी
दिल को ग़म रास है यूँ गुल को सबा हो जैसे
होश तिर्मिज़ी
दश्त-ए-वफ़ा में जल के न रह जाएँ अपने दिल
होश तिर्मिज़ी
अब तो दीवानों से यूँ बच के गुज़र जाती है
होश तिर्मिज़ी
अपने घरों के कर दिए आँगन लहू लहू
हीरानंद सोज़
अजीब हाल था अहद-ए-शबाब में दिल का
हीरानंद सोज़
हम से आदाब जीने के सीखो
हिना तैमूरी
आप के तग़ाफ़ुल का सिलसिला पुराना है
हिना तैमूरी
ज़िंदगी की बात सुन कर क्या कहें
हिमायत अली शाएर
ये कैसा क़ाफ़िला है जिस में सारे लोग तन्हा हैं
हिमायत अली शाएर
तुझ से वफ़ा न की तो किसी से वफ़ा न की
हिमायत अली शाएर
तारीकी में लिपटी हुई पुर-हौल ख़मोशी
हिमायत अली शाएर
सूरज को ये ग़म है कि समुंदर भी है पायाब
हिमायत अली शाएर
सूरज के उजाले में चराग़ाँ नहीं मुमकिन
हिमायत अली शाएर
सिर्फ़ ज़िंदा रहने को ज़िंदगी नहीं कहते
हिमायत अली शाएर
शम्अ के मानिंद अहल-ए-अंजुमन से बे-नियाज़
हिमायत अली शाएर
'शाइर' उन की दोस्ती का अब भी दम भरते हैं आप
हिमायत अली शाएर
रौशनी में अपनी शख़्सियत पे जब भी सोचना
हिमायत अली शाएर
फिर मिरी आस बढ़ा कर मुझे मायूस न कर
हिमायत अली शाएर
मैं सोचता हूँ इस लिए शायद मैं ज़िंदा हूँ
हिमायत अली शाएर
मैं सच तो बोलता हूँ मगर ऐ ख़ुदा-ए-हर्फ़
हिमायत अली शाएर
मैं कुछ न कहूँ और ये चाहूँ कि मिरी बात
हिमायत अली शाएर
किस लिए कीजे किसी गुम-गश्ता जन्नत की तलाश
हिमायत अली शाएर
इस जहाँ में तो अपना साया भी
हिमायत अली शाएर
इस दश्त-ए-सुख़न में कोई क्या फूल खिलाए
हिमायत अली शाएर
इस दश्त पे एहसाँ न कर ऐ अब्र-ए-रवाँ और
हिमायत अली शाएर
ईमाँ भी लाज रख न सका मेरे झूट की
हिमायत अली शाएर
हम भी हैं किसी कहफ़ के असहाब के मानिंद
हिमायत अली शाएर
हर तरफ़ इक मुहीब सन्नाटा
हिमायत अली शाएर
हर क़दम पर नित-नए साँचे में ढल जाते हैं लोग
हिमायत अली शाएर