Couplets Poetry (page 335)
करता हूँ एक ख़्वाब के मुबहम नुक़ूश याद
इब्राहीम होश
जो चुप लगाऊँ तो सहरा की ख़ामुशी जागे
इब्राहीम होश
इन हज़ारों में और आप, ये क्या?
इब्राहीम होश
आज ज़िंदाँ में उसे भी ले गए
इब्राहीम होश
ज़मीन की कोख ही ज़ख़्मी नहीं अंधेरों से
इब्न-ए-सफ़ी
लिखने को लिख रहे हैं ग़ज़ब की कहानियाँ
इब्न-ए-सफ़ी
हुस्न बना जब बहती गंगा
इब्न-ए-सफ़ी
डूब जाने की लज़्ज़तें मत पूछ
इब्न-ए-सफ़ी
दिन के भूले को रात डसती है
इब्न-ए-सफ़ी
दिल सा खिलौना हाथ आया है
इब्न-ए-सफ़ी
देख कर मेरा दश्त-ए-तन्हाई
इब्न-ए-सफ़ी
चाँद का हुस्न भी ज़मीन से है
इब्न-ए-सफ़ी
बुझ गया दिल तो ख़राबी हुई है
इब्न-ए-सफ़ी
बिल-आख़िर थक हार के यारो हम ने भी तस्लीम किया
इब्न-ए-सफ़ी
अजीब बात है कीचड़ में लहलहाए कँवल
इब्न-ए-सफ़ी
यूँ तो पत्थर बहुत से देखे हैं
इब्न-ए-मुफ़्ती
ये कारोबार भी कब रास आया
इब्न-ए-मुफ़्ती
याद का क्या है आ गई फिर से
इब्न-ए-मुफ़्ती
तेरे ख़्वाबों की लत लगी जब से
इब्न-ए-मुफ़्ती
फिर से वो लौट कर नहीं आया
इब्न-ए-मुफ़्ती
कर बुरा तो भला नहीं होता
इब्न-ए-मुफ़्ती
कैसा जादू है समझ आता नहीं
इब्न-ए-मुफ़्ती
जिन पे नाज़ाँ थे ये ज़मीन ओ फ़लक
इब्न-ए-मुफ़्ती
हम से शायद मो'तबर ठहरी सबा
इब्न-ए-मुफ़्ती
इक ज़रा सी बात पे ये मुँह बनाना रूठना
इब्न-ए-मुफ़्ती
दिल में सज्दे किया करो 'मुफ़्ती'
इब्न-ए-मुफ़्ती
दिल की बातों को दिल समझता है
इब्न-ए-मुफ़्ती
अब तो कर डालिए वफ़ा उस को
इब्न-ए-मुफ़्ती
यूँही तो नहीं दश्त में पहुँचे यूँही तो नहीं जोग लिया
इब्न-ए-इंशा
वो रातें चाँद के साथ गईं वो बातें चाँद के साथ गईं
इब्न-ए-इंशा