Couplets Poetry (page 330)

शिकम की आग लिए फिर रही है शहर-ब-शहर

इफ़्तिख़ार आरिफ़

शगुफ़्ता लफ़्ज़ लिक्खे जा रहे हैं

इफ़्तिख़ार आरिफ़

समुंदरों को भी हैरत हुई कि डूबते वक़्त

इफ़्तिख़ार आरिफ़

समुंदर के किनारे एक बस्ती रो रही है

इफ़्तिख़ार आरिफ़

समझ रहे हैं मगर बोलने का यारा नहीं

इफ़्तिख़ार आरिफ़

सब लोग अपने अपने क़बीलों के साथ थे

इफ़्तिख़ार आरिफ़

रोज़ इक ताज़ा क़सीदा नई तश्बीब के साथ

इफ़्तिख़ार आरिफ़

रिंद मस्जिद में गए तो उँगलियाँ उठने लगीं

इफ़्तिख़ार आरिफ़

रविश में गर्दिश-ए-सय्यारगाँ से अच्छी है

इफ़्तिख़ार आरिफ़

रास आने लगी दुनिया तो कहा दिल ने कि जा

इफ़्तिख़ार आरिफ़

रंग से ख़ुशबुओं का नाता टूटता जाता है

इफ़्तिख़ार आरिफ़

पयम्बरों से ज़मीनें वफ़ा नहीं करतीं

इफ़्तिख़ार आरिफ़

मुंहदिम होता चला जाता है दिल साल-ब-साल

इफ़्तिख़ार आरिफ़

मिट्टी की मोहब्बत में हम आशुफ़्ता-सरों ने

इफ़्तिख़ार आरिफ़

मिट्टी की गवाही से बड़ी दिल की गवाही

इफ़्तिख़ार आरिफ़

मिरे सारे हर्फ़ तमाम हर्फ़ अज़ाब थे

इफ़्तिख़ार आरिफ़

मिरे ख़ुदा मुझे इतना तो मो'तबर कर दे

इफ़्तिख़ार आरिफ़

मिरा ख़ुश-ख़िराम बला का तेज़-ख़िराम था

इफ़्तिख़ार आरिफ़

मंसब न कुलाह चाहता हूँ

इफ़्तिख़ार आरिफ़

मैं ज़िंदगी की दुआ माँगने लगा हूँ बहुत

इफ़्तिख़ार आरिफ़

मैं उस से झूट भी बोलूँ तो मुझ से सच बोले

इफ़्तिख़ार आरिफ़

मैं जिस को एक उम्र सँभाले फिरा किया

इफ़्तिख़ार आरिफ़

मैं जिस को अपनी गवाही में ले के आया हूँ

इफ़्तिख़ार आरिफ़

मैं चुप रहा कि वज़ाहत से बात बढ़ जाती

इफ़्तिख़ार आरिफ़

मैं अपने ख़्वाब से कट कर जियूँ तो मेरा ख़ुदा

इफ़्तिख़ार आरिफ़

मआल-ए-इज़्ज़त-ए-सादात-ए-इश्क़ देख के हम

इफ़्तिख़ार आरिफ़

कोई तो फूल खिलाए दुआ के लहजे में

इफ़्तिख़ार आरिफ़

कोई जुनूँ कोई सौदा न सर में रक्खा जाए

इफ़्तिख़ार आरिफ़

ख़्वाब की तरह बिखर जाने को जी चाहता है

इफ़्तिख़ार आरिफ़

खुला फ़रेब-ए-मोहब्बत दिखाई देता है

इफ़्तिख़ार आरिफ़