Couplets Poetry (page 328)

ख़ुद को हुजूम-ए-दहर में खोना पड़ा मुझे

इफ़्तिख़ार नसीम

कटी है उम्र किसी आबदोज़ कश्ती में

इफ़्तिख़ार नसीम

जिस घड़ी आया पलट कर इक मिरा बिछड़ा हुआ

इफ़्तिख़ार नसीम

जी में ठानी है कि जीना है बहर-हाल मुझे

इफ़्तिख़ार नसीम

इस क़दर भी तो न जज़्बात पे क़ाबू रक्खो

इफ़्तिख़ार नसीम

हज़ार तल्ख़ हों यादें मगर वो जब भी मिले

इफ़्तिख़ार नसीम

ग़ैर हो कोई तो उस से खुल के बातें कीजिए

इफ़्तिख़ार नसीम

फ़स्ल-ए-गुल में भी दिखाता है ख़िज़ाँ-दीदा-दरख़्त

इफ़्तिख़ार नसीम

दीवार ओ दर झुलसते रहे तेज़ धूप में

इफ़्तिख़ार नसीम

बहती रही नदी मिरे घर के क़रीब से

इफ़्तिख़ार नसीम

अगरचे फूल ये अपने लिए ख़रीदे हैं

इफ़्तिख़ार नसीम

यही चराग़ है सब कुछ कि दिल कहें जिस को

इफ़्तिख़ार मुग़ल

तू मुझ से मेरे ज़मानों का पूछती है तो सुन!

इफ़्तिख़ार मुग़ल

सवाद-ए-हिज्र में रक्खा हुआ दिया हूँ मैं

इफ़्तिख़ार मुग़ल

मोहब्बत और इबादत में फ़र्क़ तो है नाँ

इफ़्तिख़ार मुग़ल

मिरे वजूद के अंदर मुझे तलाश न कर

इफ़्तिख़ार मुग़ल

मैं तुम को ख़ुद से जुदा कर के किस तरह देखूँ

इफ़्तिख़ार मुग़ल

किसी सबब से अगर बोलता नहीं हूँ मैं

इफ़्तिख़ार मुग़ल

ख़ुदा! सिला दे दुआ का, मोहब्बतों के ख़ुदा

इफ़्तिख़ार मुग़ल

कई दिनों से मिरे साथ साथ चलती है

इफ़्तिख़ार मुग़ल

हम ने उस चेहरे को बाँधा नहीं महताब-मिसाल

इफ़्तिख़ार मुग़ल

घेर लेती है कोई ज़ुल्फ़, कोई बू-ए-बदन

इफ़्तिख़ार मुग़ल

इक ख़ला, एक ला-इंतिहा और मैं

इफ़्तिख़ार मुग़ल

अभी छुटी नहीं जन्नत की धूल पाँव से

इफ़्तिख़ार मुग़ल

आँख झपकी थी बस इक लम्हे को और इस के ब'अद

इफ़्तिख़ार मुग़ल

नश्तर-ए-ग़म न जिस को रास आया

इफ़्तिख़ार जमील शाहीन

वो ख़्वाब था बिखर गया ख़याल था मिला नहीं

इफ़्तिख़ार इमाम सिद्दीक़ी

फिर उस के ब'अद तअल्लुक़ में फ़ासले होंगे

इफ़्तिख़ार इमाम सिद्दीक़ी

जो चुप रहा तो वो समझेगा बद-गुमान मुझे

इफ़्तिख़ार इमाम सिद्दीक़ी

इक मुसलसल दौड़ में हैं मंज़िलें और फ़ासले

इफ़्तिख़ार इमाम सिद्दीक़ी