Couplets Poetry (page 325)
ताज़गी है सुख़न-ए-कुहना में ये बाद-ए-वफ़ात
इमाम बख़्श नासिख़
तमाम उम्र यूँ ही हो गई बसर अपनी
इमाम बख़्श नासिख़
तकल्लुम ही फ़क़त है उस सनम का
इमाम बख़्श नासिख़
सियह-बख़्ती में कब कोई किसी का साथ देता है
इमाम बख़्श नासिख़
शुबह 'नासिख़' नहीं कुछ 'मीर' की उस्तादी में
इमाम बख़्श नासिख़
रिफ़अत कभी किसी की गवारा यहाँ नहीं
इमाम बख़्श नासिख़
रश्क से नाम नहीं लेते कि सुन ले न कोई
इमाम बख़्श नासिख़
रात दिन नाक़ूस कहते हैं ब-आवाज़-ए-बुलंद
इमाम बख़्श नासिख़
क्या रोज़-ए-बद में साथ रहे कोई हम-नशीं
इमाम बख़्श नासिख़
ख़्वाब ही में नज़र आ जाए शब-ए-हिज्र कहीं
इमाम बख़्श नासिख़
करे जो हर क़दम पर एक नाला
इमाम बख़्श नासिख़
जुस्तुजू करनी हर इक अम्र में नादानी है
इमाम बख़्श नासिख़
जिस्म ऐसा घुल गया है मुझ मरीज़-ए-इश्क़ का
इमाम बख़्श नासिख़
हम ज़ईफ़ों को कहाँ आमद ओ शुद की ताक़त
इमाम बख़्श नासिख़
हम मय-कशों को डर नहीं मरने का मोहतसिब
इमाम बख़्श नासिख़
हो गया ज़र्द पड़ी जिस पे हसीनों की नज़र
इमाम बख़्श नासिख़
हो गए दफ़्न हज़ारों ही गुल-अंदाज़ इस में
इमाम बख़्श नासिख़
हिर-फिर के दाएरे ही में रखता हूँ मैं क़दम
इमाम बख़्श नासिख़
गो तू मिलता नहीं पर दिल के तक़ाज़े से हम
इमाम बख़्श नासिख़
गया वो छोड़ कर रस्ते में मुझ को
इमाम बख़्श नासिख़
फ़ुर्क़त क़ुबूल रश्क के सदमे नहीं क़ुबूल
इमाम बख़्श नासिख़
दिल सियह है बाल हैं सब अपने पीरी में सफ़ेद
इमाम बख़्श नासिख़
दरिया-ए-हुस्न और भी दो हाथ बढ़ गया
इमाम बख़्श नासिख़
ऐन दानाई है 'नासिख़' इश्क़ में दीवानगी
इमाम बख़्श नासिख़
ऐ अजल एक दिन आख़िर तुझे आना है वले
इमाम बख़्श नासिख़
आती जाती है जा-ब-जा बदली
इमाम बख़्श नासिख़
आने में सदा देर लगाते ही रहे तुम
इमाम बख़्श नासिख़
उन के रुख़्सत का वो लम्हा मुझे यूँ लगता है
इमाम अाज़म
तेरी ख़ुशबू से मोअत्तर है ज़माना सारा
इमाम अाज़म
संकट के दिन थे तो साए भी मुझ से कतराते थे
इमाम अाज़म