Ghazal Poetry (page 516)

नवाह-ए-दिल में ये मेरी मिसाल जलते रहें

मोहम्मद अहमद रम्ज़

न साथ आ मिरे मैं गिरते फ़ासलों में हूँ

मोहम्मद अहमद रम्ज़

मुहीत-ए-पाक पे मौज-ए-हुनर में रौशन हूँ

मोहम्मद अहमद रम्ज़

मेरे लिए क्या शोर भँवर का क्या मौजों की रवानी

मोहम्मद अहमद रम्ज़

मेरे लहू की सरशारी क्या उस की फ़ज़ा भी कितनी देर

मोहम्मद अहमद रम्ज़

लफ़्ज़ों का नैरंग है मेरे फ़न के जादू से

मोहम्मद अहमद रम्ज़

लफ़्ज़-ओ-बयाँ के पस-मंज़र तक इक क़ौस-ए-इम्कानी और

मोहम्मद अहमद रम्ज़

लफ़्ज़ ओ बयाँ के पस-मंज़र तक इक क़ौस-ए-इम्कानी और

मोहम्मद अहमद रम्ज़

क्या अब मिरी कहानी में

मोहम्मद अहमद रम्ज़

ख़ूब है इश्वा ये उस का ये इशारत उस की

मोहम्मद अहमद रम्ज़

ख़ला में हो इर्तिआश जैसे कुछ ऐसा मंज़र है और मैं हूँ

मोहम्मद अहमद रम्ज़

जुलूस-ए-तेग़-ओ-अलम जाने किस दयार का है

मोहम्मद अहमद रम्ज़

घुट के मर जाने से पहले अपनी दीवार-ए-नफ़स में दर निकालो

मोहम्मद अहमद रम्ज़

इक गहरी चुप अंदर अंदर रूह में उतरी जाए

मोहम्मद अहमद रम्ज़

डूबना है उस से ये इक़रार कर लेना मिरा

मोहम्मद अहमद रम्ज़

दिए मुंडेरों के रौशन क़तार होने लगे

मोहम्मद अहमद रम्ज़

छोड़ गया वो नक़्श-ए-हुनर अपना तुग़्यानी में

मोहम्मद अहमद रम्ज़

चार-सू सैल-ए-सिपाह-ए-मह-ओ-अख़्तर तेरा

मोहम्मद अहमद रम्ज़

बोझ सा बढ़ जाता है दिल पर शाम-ढले

मोहम्मद अहमद रम्ज़

भटक जाएगा दिल अय्यारी-ए-इदराक से निकलें

मोहम्मद अहमद रम्ज़

अभी रंग-ए-रब्त अयाँ है क़ौस-ए-ख़याल से

मोहम्मद अहमद रम्ज़

अब वो मोड़ आया कि हर पल मो'तबर होने को है

मोहम्मद अहमद रम्ज़

ज़ख़्म का इंदिमाल होते हुए

मोहम्मद अहमद

पस-ए-मर्ग-ए-तमन्ना कौन देखे

मोहम्मद अहमद

कोई मेहरबाँ नहीं साथ में कोई हात भी नहीं हात में

मोहम्मद अहमद

कहीं था मैं मुझे होना कहीं था

मोहम्मद अहमद

जुज़ रिश्ता-ए-ख़ुलूस ये रिश्ता कुछ और था

मोहम्मद अहमद

बन-सँवर कर जो वो बाज़ार निकल जाते हैं

मोहम्मद आफ़ताब अहमद साक़िब

वो बहुत ख़ुश है ख़िताबात-ओ-मुराआत के साथ

मोहम्मद आबिद अली आबिद

सर्दी-ओ-गर्मी-ओ-बरसात में आ जाता है

मोहम्मद आबिद अली आबिद