Ghazal Poetry (page 515)
डर नहीं मुझ को गुनाहों की गिराँ-बारी का
मोहम्मद अली जौहर
बे-ख़ौफ़-ए-ग़ैर दिल की अगर तर्जुमाँ न हो
मोहम्मद अली जौहर
अर्श तक जो बे-ख़ता जाता है ये वो तीर है
मोहम्मद अली जौहर
टूट कर रह गया आईने से रिश्ता अपना
मोहम्मद अली असर
सामने ख़ंजर रख कर देखें
मोहम्मद अली असर
मिरे वजूद से आती है इक सदा मुझ को
मोहम्मद अली असर
मता-ए-उम्र-ए-गुज़िश्ता समेट कर ले जा
मोहम्मद अली असर
किसी का नक़्श जो पल भर रहा है आँखों में
मोहम्मद अली असर
हर तरफ़ रात का फैला हुआ दरिया देखूँ
मोहम्मद अली असर
ग़ज़ल-मिज़ाज है यकसर ग़ज़ल का लहजा है
मोहम्मद अली असर
आवाज़ों के जंगल में सुनाई नहीं देता
मोहम्मद अली असर
आँसुओं में कभी ढली है रात
मोहम्मद अली असर
इज़्तिराब-ए-ख़ाक-ए-अमजद में कहीं रहता है वो
मोहम्मद अजमल नियाज़ी
हम अकेले ही सही शहर में क्या रखते थे
मोहम्मद अजमल नियाज़ी
गहरी आँखों में ये कैसी है बिछड़ती महफ़िलों की रौशनी
मोहम्मद अजमल नियाज़ी
इक शख़्स जज़ीरा राज़ों का और हम सब उस में रहते हैं
मोहम्मद अजमल नियाज़ी
इक शख़्स जज़ीरा राज़ों का और हम सब इस में रहते हैं
मोहम्मद अजमल नियाज़ी
बिखरती ख़ाक में कोई ख़ज़ाना ढूँढती है
मोहम्मद अजमल नियाज़ी
ये ज़ाद-ए-राह किसी मरहले में रख देना
मोहम्मद अहमद रम्ज़
ये भी कोई बात कि सिर्फ़ तमाशा कर
मोहम्मद अहमद रम्ज़
उट्ठे ग़ुबार-ए-शोर-ए-नफ़स तो वहशत मत करना
मोहम्मद अहमद रम्ज़
उस के जुनूँ का ख़्वाब है किन ताबीरों में
मोहम्मद अहमद रम्ज़
उस पार बनती मिटती धनक उस के नाम की
मोहम्मद अहमद रम्ज़
थी मिरी हम-सफ़री एक दुआ उस के लिए
मोहम्मद अहमद रम्ज़
तैरता मौज-ए-हवा सा आसमानों में कहीं
मोहम्मद अहमद रम्ज़
तैरता मौज-ए-हवा सा आसमानों में कहीं
मोहम्मद अहमद रम्ज़
सुलगने राख हो जाने का डर क्यूँ लग रहा है
मोहम्मद अहमद रम्ज़
शोरिश-ए-ख़ाकिस्तर-ए-ख़ूँ को हवा देने से क्या
मोहम्मद अहमद रम्ज़
फिर इक तीर सँभाला उस ने मुझ पे नज़र डाली
मोहम्मद अहमद रम्ज़
पल पल मिरी ख़्वाहिश को फिर अंगेज़ किए जाए
मोहम्मद अहमद रम्ज़