Ghazal Poetry (page 513)
हुआ चली तो मिरे जिस्म ने कहा मुझ को
मोहम्मद अल्वी
हज़ारों लाखों दिल्ली में मकाँ हैं
मोहम्मद अल्वी
हर-चंद जागते हैं प सोए हुए से हैं
मोहम्मद अल्वी
हर इक झोंका नुकीला हो गया है
मोहम्मद अल्वी
गुलों के दरमियाँ अच्छी लगी हैं
मोहम्मद अल्वी
गिरह में रिश्वत का माल रखिए
मोहम्मद अल्वी
घर से बाहर किस बला का शोर था
मोहम्मद अल्वी
घर ने अपना होश सँभाला दिन निकला
मोहम्मद अल्वी
इक लड़का था इक लड़की थी
मोहम्मद अल्वी
दुख का एहसास न मारा जाए
मोहम्मद अल्वी
दिन में परियाँ क्यूँ आती हैं
मोहम्मद अल्वी
दिन इक के बा'द एक गुज़रते हुए भी देख
मोहम्मद अल्वी
दिन भर के दहकते हुए सूरज से लड़ा हूँ
मोहम्मद अल्वी
धूप ने गुज़ारिश की
मोहम्मद अल्वी
धूप में सब रंग गहरे हो गए
मोहम्मद अल्वी
दवा कोई क्या काम लिखूँ
मोहम्मद अल्वी
चाँद की कगर रौशन
मोहम्मद अल्वी
चाक कर लो अगर गिरेबाँ है
मोहम्मद अल्वी
बिना मुर्ग़े के पर झटकती हैं
मोहम्मद अल्वी
बरसों घिसा-पिटा हुआ दरवाज़ा छोड़ कर
मोहम्मद अल्वी
और कोई चारा न था और कोई सूरत न थी
मोहम्मद अल्वी
और बाज़ार से क्या ले जाऊँ
मोहम्मद अल्वी
ऐसा हुआ नहीं है पर ऐसा न हो कहीं
मोहम्मद अल्वी
अच्छे दिन कब आएँगे
मोहम्मद अल्वी
अचानक तिरी याद का सिलसिला
मोहम्मद अल्वी
अभी तो और भी दिन बारिशों के आने थे
मोहम्मद अल्वी
अब के बरसात में पानी आए
मोहम्मद अल्वी
आया है एक शख़्स अजब आन-बान का
मोहम्मद अल्वी
आँख में दहशत न थी हाथ में ख़ंजर न था
मोहम्मद अल्वी
आग पानी से डरता हुआ मैं ही था
मोहम्मद अल्वी