Ghazal Poetry (page 511)
दोस्ती चाह दिली मेहर-ओ-मोहब्बत गुज़री
मोहम्मद अमान निसार
देखे कहीं मुझ को तो लब-ए-बाम से हट जाए
मोहम्मद अमान निसार
चोरी चोरी आँख लड़ते में दिखा दूँ तो सही
मोहम्मद अमान निसार
बार-ए-ख़ातिर बाग़बाँ का ने दिल-आज़ार-ए-चमन
मोहम्मद अमान निसार
अश्क हुए हैं अबतर ऐसे हम को बहाए देते हैं
मोहम्मद अमान निसार
ज़मीन लोगों से डर गई है
मोहम्मद अल्वी
ज़मीं कहीं भी न थी चार-सू समुंदर था
मोहम्मद अल्वी
यूँही हम पर सब के एहसाँ हैं बहुत
मोहम्मद अल्वी
यूँ तो कम कम थी मोहब्बत उस की
मोहम्मद अल्वी
यार आज मैं ने भी इक कमाल करना है
मोहम्मद अल्वी
यक्का उलट के रह गया घोड़ा भड़क गया
मोहम्मद अल्वी
वो मेरे साथ आने पे तय्यार हो गया
मोहम्मद अल्वी
वो दिन कितना अच्छा था
मोहम्मद अल्वी
उठते हुए क़दमों की धमक आने लगी है
मोहम्मद अल्वी
उठी कुछ ऐसे बदन की ख़ुश्बू
मोहम्मद अल्वी
उसे न देख के देखा तो क्या मिला मुझ को
मोहम्मद अल्वी
तीसरी आँख खुलेगी तो दिखाई देगा
मोहम्मद अल्वी
थोड़ी सर्दी ज़रा सा नज़ला है
मोहम्मद अल्वी
सुखाने बाल ही कोठे पे आ गए होते
मोहम्मद अल्वी
सोते सोते अचानक गली डर गई
मोहम्मद अल्वी
सोचते रहते हैं अक्सर रात में
मोहम्मद अल्वी
शोर साहिल का समुंदर में न था
मोहम्मद अल्वी
शेर तो सब कहते हैं क्या है
मोहम्मद अल्वी
शरीफ़े के दरख़्तों में छुपा घर देख लेता हूँ
मोहम्मद अल्वी
शांति की दुकानें खोली हैं
मोहम्मद अल्वी
शगुन ले कर न क्यूँ घर से चला मैं
मोहम्मद अल्वी
सातवीं मंज़िल से कूदा चाहिए
मोहम्मद अल्वी
सर्दी में दिन सर्द मिला
मोहम्मद अल्वी
सफ़र में सोचते रहते हैं छाँव आए कहीं
मोहम्मद अल्वी
सच कहाँ कहता है जाने वाला
मोहम्मद अल्वी