Ghazal Poetry (page 512)
सच है कि वो बुरा था हर इक से लड़ा किया
मोहम्मद अल्वी
रौशनी कुछ तो मिले जंगल में
मोहम्मद अल्वी
रात पड़े घर जाना है
मोहम्मद अल्वी
रात मिली तन्हाई मिली और जाम मिला
मोहम्मद अल्वी
रात के मुँह पर उजाला चाहिए
मोहम्मद अल्वी
पढ़ के हैराँ हूँ ख़बर अख़बार में
मोहम्मद अल्वी
ऑफ़िस में भी घर को खुला पाता हूँ मैं
मोहम्मद अल्वी
नींद रातों की उड़ा देते हैं
मोहम्मद अल्वी
न जाने दिल कहाँ रहने लगा है
मोहम्मद अल्वी
मुँह-ज़बानी क़ुरआन पढ़ते थे
मोहम्मद अल्वी
मैं अपने आप से डरने लगा था
मोहम्मद अल्वी
मैं अपना नाम तिरे जिस्म पर लिखा देखूँ
मोहम्मद अल्वी
लबों पर यूँही सी हँसी भेज दे
मोहम्मद अल्वी
क्या कहते क्या जी में था
मोहम्मद अल्वी
कुछ तो इस दिल को सज़ा दी जाए
मोहम्मद अल्वी
कोई मौसम हो भले लगते थे
मोहम्मद अल्वी
कोई बैंड-बाजा सा कानों में था
मोहम्मद अल्वी
कितना हसीन था तू कभी कुछ ख़याल कर
मोहम्मद अल्वी
ख़्वाब में एक मकाँ देखा था
मोहम्मद अल्वी
खिड़कियों से झाँक कर गलियों में डर देखा किए
मोहम्मद अल्वी
कल रात सूनी छत पे अजब सानेहा हुआ
मोहम्मद अल्वी
कल रात जगमगाता हुआ चाँद देख कर
मोहम्मद अल्वी
कभी तुझ से ऐसा भी याराना था
मोहम्मद अल्वी
कभी तो ऐसा भी हो राह भूल जाऊँ मैं
मोहम्मद अल्वी
जाती हुई लड़की को सदा देना चाहिए
मोहम्मद अल्वी
जाते जाते देखना पत्थर में जाँ रख जाऊँगा
मोहम्मद अल्वी
इस की बात का पाँव न सर
मोहम्मद अल्वी
इस शहर में कहीं पे हमारा मकाँ भी हो
मोहम्मद अल्वी
इरादा है किसी जंगल में जा रहूँगा मैं
मोहम्मद अल्वी
इधर रहा हूँ उधर रहा हूँ
मोहम्मद अल्वी