Ghazal Poetry (page 520)
अच्छी निभी बुतान-ए-सितम-आश्ना के साथ
मिर्ज़ा क़ुर्बान अली बेग सालिक
कहने में नहीं हैं वो हमारे कई दिन से
मिर्ज़ा शौक़ लखनवी
आप की गर मेहरबानी हो चुकी
मिर्ज़ा शौक़ लखनवी
ये जोश-ए-ग़म है कि सीने में ख़ूँ उबलता है
मिर्ज़ा रज़ा क़ुली अशुफ़्ता
मौत ही चारा-साज़-ए-फुर्क़त है
मिर्ज़ा रहीमुद्दीन हया
पहले न उड़ाया किसी बेकस के जिगर को
मिर्ज़ा क़ादिर बख़्श साबिर देहलवी
जो दिल को मोहब्बत के मज़े आए हुए हैं
मिर्ज़ा क़ादिर बख़्श साबिर देहलवी
जो दिल को मोहब्बत के मज़े आए हुए हैं
मिर्ज़ा क़ादिर बख़्श साबिर देहलवी
ये इन दिनों जो हम से इतनी रुखाइयाँ हैं
मिर्ज़ा नईम बेग जवान
यही कहती लैली-ए-सोख़्ता-जाँ नहीं खाती अदब से ख़ुदा की क़सम
मिर्ज़ा मोहम्मद तक़ी हवस
उस परी-रू ने न मुझ से है निबाही क्या करूँ
मिर्ज़ा मोहम्मद तक़ी हवस
तू जो पड़ा फिरता है आज कहीं कल कहीं
मिर्ज़ा मोहम्मद तक़ी हवस
शौक़-ए-ख़राश-ए-ख़ार मिरे दिल में रह गया
मिर्ज़ा मोहम्मद तक़ी हवस
रंग-ए-गुल-ए-शगुफ़्ता हूँ आब-ए-रुख़-ए-चमन हूँ मैं
मिर्ज़ा मोहम्मद तक़ी हवस
नित जी ही जी में इश्क़ के सदमे उठाइयो
मिर्ज़ा मोहम्मद तक़ी हवस
न पाया खोज बरसों नक़्श-ए-पा-ए-रफ़्तगाँ ढूँढे
मिर्ज़ा मोहम्मद तक़ी हवस
मुज़्दा ये सबा उस बुत-ए-बे-बाक को पहुँचा
मिर्ज़ा मोहम्मद तक़ी हवस
माथे पे लगा संदल वो हार पहन निकले
मिर्ज़ा मोहम्मद तक़ी हवस
मैं न समझा बुलबुल बे-बाल-ओ-पर ने क्या कहा
मिर्ज़ा मोहम्मद तक़ी हवस
मैं कहा बोलना शब ग़ैर से था तुम को क्या
मिर्ज़ा मोहम्मद तक़ी हवस
क्या मज़ा हो जो किसी से तुझे उल्फ़त हो जाए
मिर्ज़ा मोहम्मद तक़ी हवस
क्या दिन थे जब छुप छुप कर तुम पास हमारे आते थे
मिर्ज़ा मोहम्मद तक़ी हवस
जवानी याद हम को अपनी फिर बे-इख़्तियार आई
मिर्ज़ा मोहम्मद तक़ी हवस
जंगलों में जुस्तुजू-ए-क़ैस-ए-सहराई करूँ
मिर्ज़ा मोहम्मद तक़ी हवस
हम से वारफ़्ता उल्फ़त हैं बहुत कम पैदा
मिर्ज़ा मोहम्मद तक़ी हवस
हुए आज़िम-ए-मुल्क-ए-अदम जो 'हवस' तो ख़ुशी ये हुई थी कि ग़म से छुटे
मिर्ज़ा मोहम्मद तक़ी हवस
हुए आज बूढ़े जवानी में क्या थे
मिर्ज़ा मोहम्मद तक़ी हवस
हरगिज़ न मिरे महरम-ए-हमराज़ हुए तुम
मिर्ज़ा मोहम्मद तक़ी हवस
हँसते थे मिरे हाल को जो यार देख कर
मिर्ज़ा मोहम्मद तक़ी हवस
देखें क्या अब के असीरी हमें दिखलाती है
मिर्ज़ा मोहम्मद तक़ी हवस