Ghazal Poetry (page 521)
बे-वज्ह नहीं गर्द परेशाँ पस-ए-महमिल
मिर्ज़ा मोहम्मद तक़ी हवस
वाइज़ पिए हुए हूँ ख़ुदा के लिए न छेड़
मिर्ज़ा मायल देहलवी
तुम ले के अपने हाथ में ख़ंजर न देखना
मिर्ज़ा मायल देहलवी
तुम ख़ूब उड़ाते रहो ख़ाका मिरे दिल का
मिर्ज़ा मायल देहलवी
शुक्र उस ने किया लब पे मगर नाम न आया
मिर्ज़ा मायल देहलवी
फिर आ गई इक बुत पे तबीअत को हुआ क्या
मिर्ज़ा मायल देहलवी
न हो शबाब तो कैफ़िय्यत-ए-शराब कहाँ
मिर्ज़ा मायल देहलवी
किस मुँह से करूँ मैं तन-ए-उर्यां की शिकायत
मिर्ज़ा मायल देहलवी
डूबा हुआ उठूँ दम-ए-महशर शराब में
मिर्ज़ा मायल देहलवी
बन बन के बिगड़ जाएगी तदबीर कहाँ तक
मिर्ज़ा मायल देहलवी
बातें हैं वाइज़ों की अज़ाब ओ सवाब क्या
मिर्ज़ा मायल देहलवी
अश्क-ए-गुलगूँ को न ख़ून-ए-शोहदा को देखा
मिर्ज़ा मायल देहलवी
ऐसी क्या थीं इताब की बातें
मिर्ज़ा मायल देहलवी
ऐ सितमगर नहीं देखा जाता
मिर्ज़ा मायल देहलवी
आप क्या एक सितमगार बने बैठे हैं
मिर्ज़ा मायल देहलवी
ये जिस ने जान दी है नान देगा
मिर्ज़ा मासिता बेग मुंतही
याद है रोज़-ए-अज़ल उस ने कहा क्या क्या कुछ
मिर्ज़ा मासिता बेग मुंतही
सुब्ह-दम उठ कर तिरा पहलू से जाना याद है
मिर्ज़ा मासिता बेग मुंतही
सर-सर गेसू हिला रही है
मिर्ज़ा मासिता बेग मुंतही
रह गए अश्कों में लख़्त-ए-जिगर आते आते
मिर्ज़ा मासिता बेग मुंतही
क़ातिल-ए-आलम से क्या याराना है
मिर्ज़ा मासिता बेग मुंतही
नफ़्स-ए-सग-ए-पलीद को गर अपने मारिए
मिर्ज़ा मासिता बेग मुंतही
मुमकिन मुझे जो हो बे-रिया हो
मिर्ज़ा मासिता बेग मुंतही
मुब्तला ये दिल हुआ जब यार नंगा हो गया
मिर्ज़ा मासिता बेग मुंतही
मीठी है ऐसी बात उस की
मिर्ज़ा मासिता बेग मुंतही
मंसूर पीते ही मय-ए-उल्फ़त बहक गया
मिर्ज़ा मासिता बेग मुंतही
करते हैं चैन बैठे हुस्न-ओ-जमाल वाले
मिर्ज़ा मासिता बेग मुंतही
कली जो गुल की चटक रही है तबीअ'त अपनी खटक रही है
मिर्ज़ा मासिता बेग मुंतही
जवानी की हालत गुज़र जाएगी
मिर्ज़ा मासिता बेग मुंतही
जौर-ए-अफ़्लाक बस-कि झेले हैं
मिर्ज़ा मासिता बेग मुंतही