Ghazal Poetry (page 523)
नम-ए-अश्क आँखों से ढलने लगा है
मिर्ज़ा अज़फ़री
मह-रू न हो और चाँदनी वो रात है किस काम की
मिर्ज़ा अज़फ़री
किया है तू ने तो जान-ए-जहाँ जहाँ तस्ख़ीर
मिर्ज़ा अज़फ़री
ख़िज़ाँ तन्हा न सैर-ए-बोस्ताँ को जा बिगाड़ आई
मिर्ज़ा अज़फ़री
कहा किस ने कि तुम ये वो न बोलो
मिर्ज़ा अज़फ़री
जी में क्या क्या मिरी उमाहा था
मिर्ज़ा अज़फ़री
जबकि ग़ुस्से के बीच आते हो
मिर्ज़ा अज़फ़री
जब कि ज़ुल्फ़ उस की गले खा बल पड़ी
मिर्ज़ा अज़फ़री
जान आ बर में कि फिर कुछ ग़म-ओ-वसवास नहीं
मिर्ज़ा अज़फ़री
इस की सूरत को देख कर भूले
मिर्ज़ा अज़फ़री
हमें छोड़ कीधर सिधारे पियारे
मिर्ज़ा अज़फ़री
हैं जाने-बूझे यार हम, हम साथ अन-जानी न कर
मिर्ज़ा अज़फ़री
गिरह जो काम में डाले है पंजा-ए-तक़दीर
मिर्ज़ा अज़फ़री
ग़ुबार दिल में भरा किर्किरी सलाम-अलैक
मिर्ज़ा अज़फ़री
ग़ैरों के साथ गाते जाते हो
मिर्ज़ा अज़फ़री
एक बर्छी से मार जाते हो
मिर्ज़ा अज़फ़री
दोस्ती में तिरी बस हम ने बहुत दुख झेले
मिर्ज़ा अज़फ़री
ढोलकी धम-धमी ख़ंजरी भी बजानी जानी
मिर्ज़ा अज़फ़री
देख अपने माइलों को कि हैं दिल जले पड़े
मिर्ज़ा अज़फ़री
भौवें चढ़ी हैं और है तेवर झुका हुआ
मिर्ज़ा अज़फ़री
बारकल्लाह मैं तिरे हुस्न की क्या बात कहूँ
मिर्ज़ा अज़फ़री
आते आते तर्फ़ मेरे मुड़ के फिर कीधर चले
मिर्ज़ा अज़फ़री
कल चश्म-ए-ख़ूँ-फ़िशाँ से गुलज़ार पैरहन था
मिर्ज़ा अज़ीम बेग 'अज़ीम'
ये कैसी आग मुझ में जल रही है
मिर्ज़ा अतहर ज़िया
ग़म-ए-जिगर-शिकन ओ दर्द जाँ-सिताँ देखा
मीर मोहम्मदी बेदार
गया है जब से दिखा जल्वा वो परी-रुख़्सार
मीर मोहम्मदी बेदार
गर कहीं उस को जल्वा-गर देखा
मीर मोहम्मदी बेदार
गर इसी तरह सज बनाइएगा
मीर मोहम्मदी बेदार
गर एक रात गुज़र याँ वो रश्क-ए-माह करे
मीर मोहम्मदी बेदार
गर बड़े मर्द हो तो ग़ैर को याँ जा दीजे
मीर मोहम्मदी बेदार