Ghazal Poetry (page 525)

मैं कई बरसों से तेरी जुस्तुजू करती रही

इरम ज़ेहरा

कितनी दूर से चलते चलते ख़्वाब-नगर तक आई हूँ

इरम ज़ेहरा

कैसे बनाऊँ हाथ पर तस्वीर ख़्वाब की

इरम ज़ेहरा

हम उस के सामने हुस्न-ओ-जमाल क्या रखते

इरम ज़ेहरा

हम बाग़-ए-तमन्ना में दिन अपने गुज़ार आए

इरम लखनवी

दर्द का जब तक मज़ा हासिल न था

इरम लखनवी

अपने ग़रीब दिल की बात करते हैं राएगाँ कहाँ

इरम लखनवी

मैं सुनता रहता हूँ नग़्मे कमाल के अंदर

इक़तिदार जावेद

हज़ार बार वो बैठा हज़ार बार उठा

इक़तिदार जावेद

मौसमों की बातों तक गुफ़्तुगू रही अपनी

इक़बाल उमर

मैं कि वक़्फ़-ए-ग़म-ए-दौराँ न हुआ था सो हुआ

इक़बाल उमर

इसी सबब से तो हम लोग पेश-ओ-पस में हैं

इक़बाल उमर

हर बात जो न होना थी ऐसी हुई कि बस

इक़बाल उमर

एक इक लम्हा कि एक एक सदी हो जैसे

इक़बाल उमर

दोस्तों में वाक़ई ये बहस भी अक्सर हुई

इक़बाल उमर

छतों पे आग रही बाम-ओ-दर पे धूप रही

इक़बाल उमर

अब इलाज-ए-दिल-ए-बीमार-ए-सहर हो कि न हो

इक़बाल उमर

ज़िंदाँ-नसीब हूँ मिरे क़ाबू में सर नहीं

इक़बाल सुहैल

ज़बानों पर नहीं अब तूर का फ़साना बरसों से

इक़बाल सुहैल

ये इत्र बे-ज़ियाँ नहीं नसीम-ए-नौ-बहार की

इक़बाल सुहैल

उफ़ क्या मज़ा मिला सितम-ए-रोज़गार में

इक़बाल सुहैल

सदा फ़रियाद की आए कहीं से

इक़बाल सुहैल

पैग़ाम-ए-रिहाई दिया हर चंद क़ज़ा ने

इक़बाल सुहैल

न रहा ज़ौक़-ए-रंग-ओ-बू मुझ को

इक़बाल सुहैल

कहाँ ताक़त ये रूसी को कहाँ हिम्मत ये जर्मन को

इक़बाल सुहैल

जो तसव्वुर से मावरा न हुआ

इक़बाल सुहैल

हुस्न-ए-फ़ितरत की आबरू मुझ से

इक़बाल सुहैल

असीरों में भी हो जाएँ जो कुछ आशुफ़्ता-सर पैदा

इक़बाल सुहैल

अंजाम-ए-वफ़ा भी देख लिया अब किस लिए सर ख़म होता है

इक़बाल सुहैल

अब दिल को हम ने बंदा-ए-जानाँ बना दिया

इक़बाल सुहैल