Ghazal Poetry (page 522)
जान दी उन पे मर-मिटे सिसके
मिर्ज़ा मासिता बेग मुंतही
हुस्न की दिल में मिरे जल्वागरी रहती है
मिर्ज़ा मासिता बेग मुंतही
हमेशा सैर-ए-गुल-ओ-लाला-ज़ार बाक़ी है
मिर्ज़ा मासिता बेग मुंतही
फ़ुग़ान-ओ-आह से पैदा किया दर्द-ए-जुदाई को
मिर्ज़ा मासिता बेग मुंतही
फ़ुग़ान-ओ-आह है हर-दम पुकार रखता है
मिर्ज़ा मासिता बेग मुंतही
दुनिया में यही चोर बनाता है असस को
मिर्ज़ा मासिता बेग मुंतही
दर पे उस शोख़ के जब जा बैठा
मिर्ज़ा मासिता बेग मुंतही
दैर-ओ-हरम को छोड़ के ऐ दिल चल बैठो मयख़ाने में
मिर्ज़ा मासिता बेग मुंतही
बज़्म-ए-आलम में बहुत से हम ने मारे हाथ-पाँव
मिर्ज़ा मासिता बेग मुंतही
आप आए थे याँ जफ़ा के लिए
मिर्ज़ा मासिता बेग मुंतही
पुकारने का क़रीना मैं सोचता ही रहा
मिर्ज़ा महमुद सरहदी
बुताँ जब कि ज़ुल्फ़-ए-दोता बाँधते हैं
मिर्ज़ा इब्राहीम बेग मक़तूल
गई यक-ब-यक जो हवा पलट नहीं दिल को अपने क़रार है
मिर्ज़ा हुसामुद्दीन हैदर हुसामी
नासेह ये नसीहत न सुना मैं नहीं सुनता
मिर्ज़ा हुसैन अली मेहनत
है अँखड़ियों में नींद तो इक काम कीजिए
मिर्ज़ा हुसैन अली मेहनत
गर यही वज़्अ है और हैं यही हैहात नसीब
मिरज़ा हैदर अली हैरान
नाला रुकता है तो सर-गर्म-ए-जफ़ा होता है
मिर्ज़ा हादी रुस्वा
बहुत से मुद्दई' निकले मगर जाँ-बाज़ कम निकले
मिर्ज़ा हादी रुस्वा
अतवार तिरे अहल-ए-ज़मीं से नहीं मिलते
मिर्ज़ा हादी रुस्वा
ये दिल वो है कि ग़मों से जिसे फ़राग़ नहीं
मिर्ज़ा अज़फ़री
तुम खुल रहे थे ग़ैर से छाँव तले खड़े
मिर्ज़ा अज़फ़री
तुझ में जिस दम धियान जाता है
मिर्ज़ा अज़फ़री
तू बातों में बिगड़ जाता है मुझ से
मिर्ज़ा अज़फ़री
तू आशिक़ों के तईं जब से क़त्ल-ए-नाज़ किया
मिर्ज़ा अज़फ़री
तिरी तेग़ अबरू की टुक सामने कर देखें तो
मिर्ज़ा अज़फ़री
सोज़-ए-शम्-ए-हिज्र से शब जल गए
मिर्ज़ा अज़फ़री
सोच में तेरे सुना रात जो खटका-पटका
मिर्ज़ा अज़फ़री
सीने का अब तक है ज़ख़्म आला मियाँ
मिर्ज़ा अज़फ़री
शिताबी अपने दीवाने को कर बंद
मिर्ज़ा अज़फ़री
समझ घर यार का मैं शह-नशीन-ए-दिल को धोता हूँ
मिर्ज़ा अज़फ़री