Ghazal Poetry (page 519)
बे-शौक़-ए-तलब बे-ज़ौक़-ए-नज़र बे-रंग थी उन की गुल-बदनी
मुग़ीसुद्दीन फ़रीदी
बरसों जो नज़र तूफ़ानों के आग़ोश में पलती रहती है
मुग़ीसुद्दीन फ़रीदी
अंदाज़-ए-सुख़न मस्लहत-आमेज़ बहुत है
मुग़ीसुद्दीन फ़रीदी
आँसू भी बहा कर देख लिए सोज़-ए-ग़म-ए-पिन्हाँ कम न हुआ
मुग़ीसुद्दीन फ़रीदी
उम्मीद है कि मुझ को ख़ुदा आदमी करे
मियाँ नूर उल इस्लाम मुंतज़िर
तरब का रंग रुख़-ए-गुल पे आश्कार आया
मियाँ हाजी तजल्ली
तर्क इन दिनों जो यार से गुफ़्त-ओ-शुनीद है
मियाँ दाद ख़ां सय्याह
क़ैस जंगल में अकेला है मुझे जाने दो
मियाँ दाद ख़ां सय्याह
नहीं मिलता दिला हम को निशाँ तक
मियाँ दाद ख़ां सय्याह
कौन सय्याद इधर बहर-ए-शिकार आता है
मियाँ दाद ख़ां सय्याह
कभी इधर जो सग-ए-कू-ए-यार आ निकला
मियाँ दाद ख़ां सय्याह
जब से देखा है बना गोश-ए-क़मर में तिनका
मियाँ दाद ख़ां सय्याह
है दिल को इस तरह से मिरे यार की तलाश
मियाँ दाद ख़ां सय्याह
अपने ही दम से है चर्चा कुफ़्र और इस्लाम का
मियाँ दाद ख़ां सय्याह
तस्बीह से ग़रज़ है न ज़ुन्नार से ग़रज़
मिस्कीन शाह
सुनते ही दिल हो गया उस यार का असरार मस्त
मिस्कीन शाह
शम्अ' रौशन जिस्म-ए-फ़ानूस-ए-ख़याली में है आज
मिस्कीन शाह
नहीं है मुझ को ऐ जमशेद तेरे जाम से काम
मिस्कीन शाह
मेरा शाहिद वो हमें अय्यार आता है नज़र
मिस्कीन शाह
माह-रू याँ हज़ार को देखा
मिस्कीन शाह
किसी का एक है दुश्मन तो दोस्त-दार है एक
मिस्कीन शाह
कल हम से मुलाक़ात में वो यार जो की बहस
मिस्कीन शाह
वक़्त के ज़ालिम समुंदर में परेशानी के साथ
मिस्दाक़ आज़मी
तअल्लुक़ की कड़ी टूटी नहीं है
मिस्दाक़ आज़मी
सुब्ह का मंज़र है लेकिन गुल कोई ताज़ा नहीं
मिस्दाक़ आज़मी
इक ज़रूरत है जो तहवील तक आ पहुँची है
मिस्दाक़ आज़मी
आहटें सुन कर ही मर जाती है सहराओं की ख़ाक
मिस्दाक़ आज़मी
वो ज़ेब-ए-शबिस्ताँ हुआ चाहता है
मिर्ज़ा क़ुर्बान अली बेग सालिक
वाइ'ज़ मिलेगी ख़ुल्द में कब इस क़दर शराब
मिर्ज़ा क़ुर्बान अली बेग सालिक
तिरा आना गर ऐ रश्क-ए-मसीहा हो नहीं सकता
मिर्ज़ा क़ुर्बान अली बेग सालिक