ख्वाब Poetry (page 38)
मचलती है मिरे सीने में तेरी आरज़ू क्या क्या
फ़रोग़ हैदराबादी
इस क़दर महव-ए-तसव्वुर हूँ सितमगर तेरा
फ़रोग़ हैदराबादी
हथेली से ठंडा धुआँ उठ रहा है
फरीहा नक़वी
एक पुराना ख़्वाब
फरीहा नक़वी
वो अगर अब भी कोई अहद निभाना चाहे
फरीहा नक़वी
शनासाई का सिलसिला देखती हूँ
फरीहा नक़वी
लाख दिल ने पुकारना चाहा
फरीहा नक़वी
क्यूँ दिया था? बता! मेरी वीरानियों में सहारा मुझे
फरीहा नक़वी
हम तोहफ़े में घड़ियाँ तो दे देते हैं
फरीहा नक़वी
बीते ख़्वाब की आदी आँखें कौन उन्हें समझाए
फरीहा नक़वी
हम एक फ़िक्र के पैकर हैं इक ख़याल के फूल
फ़ारिग़ बुख़ारी
हज़ार तर्क-ए-वफ़ा का ख़याल हो लेकिन
फ़ारिग़ बुख़ारी
ख़तरे का निशान
फ़ारिग़ बुख़ारी
यादों का अजीब सिलसिला है
फ़ारिग़ बुख़ारी
वो रौशनी है कहाँ जिस के बाद साया नहीं
फ़ारिग़ बुख़ारी
मसीह-ए-वक़्त सही हम को उस से क्या लेना
फ़ारिग़ बुख़ारी
मैं कि अब तेरी ही दीवार का इक साया हूँ
फ़ारिग़ बुख़ारी
क्या अदू क्या दोस्त सब को भा गईं रुस्वाइयाँ
फ़ारिग़ बुख़ारी
ख़िरद भी ना-मेहरबाँ रहेगी शुऊ'र भी सर-गराँ रहेगा
फ़ारिग़ बुख़ारी
हुए हैं सर्द दिमाग़ों के दहके दहके अलाव
फ़ारिग़ बुख़ारी
देखे कोई जो चाक-ए-गरेबाँ के पार भी
फ़ारिग़ बुख़ारी
देखा तुझे तो आँखों ने ऐवाँ सजा लिए
फ़ारिग़ बुख़ारी
लाख रहे शहरों में फिर भी अंदर से देहाती थे
फ़रहत ज़ाहिद
ये ज़मीं ख़्वाब है आसमाँ ख़्वाब है
फ़रहत शहज़ाद
ये ज़मीं ख़्वाब है आसमाँ ख़्वाब है
फ़रहत शहज़ाद
मैं अपने-आप से बरहम था वो ख़फ़ा मुझ से
फ़रहत शहज़ाद
जब तक चराग़-ए-शाम-ए-तमन्ना जले चलो
फ़रहत शहज़ाद
हयात को तिरी दुश्वार किस तरह करता
फ़रहत शहज़ाद
आँख को जकड़े थे कल ख़्वाब अज़ाबों के
फ़रहत शहज़ाद
मेरा हर ख़्वाब तो बस ख़्वाब ही जैसा निकला
फ़रहत नदीम हुमायूँ