ख्वाब Poetry (page 69)
मैं तिरे शहर में फिरती रही मारी मारी
असरा रिज़वी
मैं सच तो कह दूँ पर उस को कहीं बुरा न लगे
असरा रिज़वी
दर्द की जोत मिरे दिल में जगाने वाले
असरा रिज़वी
बे-सबब ख़ौफ़ से दिल मेरा लरज़ता क्यूँ है
असरा रिज़वी
ऐसा ये दर्द है कि भुलाया न जाएगा
असरा रिज़वी
अदावतों का ये उस को सिला दिया हम ने
असरा रिज़वी
आँख से तारे टूट रहे हैं
असलम राशिद
रात आती है तो ताक़ों में जलाते हैं चराग़
असलम महमूद
मैं एक रेत का पैकर था और बिखर भी गया
असलम महमूद
तू अपने शहर-ए-तरब से न पूछ हाल मिरा
असलम महमूद
सराब-ए-मअनी-ओ-मफ़्हूम में भटकते हैं
असलम महमूद
रात आती है तो ताक़ों में जलाते हैं चराग़
असलम महमूद
न मलाल-ए-हिज्र न मुंतज़िर हैं हवा-ए-शाम-ए-विसाल के
असलम महमूद
मिज़ा पे ख़्वाब नहीं इंतिज़ार सा कुछ है
असलम महमूद
मैं एक रेत का पैकर था और बिखर भी गया
असलम महमूद
किया गर्दिशों के हवाले उसे चाक पर रख दिया
असलम महमूद
देख के अर्ज़ां लहू सुर्ख़ी-ए-मंज़र ख़मोश
असलम महमूद
अक्स जल जाएँगे आईने बिखर जाएँगे
असलम महमूद
यार को दीदा-ए-ख़ूँ-बार से ओझल कर के
असलम कोलसरी
दिल-ए-पुर-ख़ूँ को यादों से उलझता छोड़ देते हैं
असलम कोलसरी
भीगे शेर उगलते जीवन बीत गया
असलम कोलसरी
जश्न हम यूँ भी मनाएँ देर तक
असलम हनीफ़
लुटी बहार का सूखा गुलाब रहने दो
असलम हबीब
किसी की याद का साया था या कि झोंका था
असलम हबीब
मैं सोचता हूँ कहीं तू ख़फ़ा न हो जाए
असलम फ़र्रुख़ी
बचपन के हैं ख़्वाब सुहाने तितली फूल और मैं
असलम फ़ैज़ी
हम भी 'असलम' इसी गुमान में हैं
असलम इमादी
शाम का रक़्स
असलम इमादी
वो शब-ए-ग़म जो कम अँधेरी थी
असलम इमादी
लिबास-ए-गुल में वो ख़ुशबू के ध्यान से निकला
असलम बदर