ख्वाब Poetry (page 67)
गुज़िश्ता रात कोई चाँद घर में उतरा था
अतीक़ अंज़र
जुदाई हद से बढ़ी तो विसाल हो ही गया
अतीक़ इलाहाबादी
शजर से मिल के जो रोने लगा था
अतीक़ अहमद
मैं अपनी सोचों में एक दरिया बना रहा था
अतीक़ अहमद
मैं अपनी ख़ाक को जब आइना बनाता हूँ
अतीक़ अहमद
वक़्त ने लूटे हैं हस्ती के ख़ज़ाने कितने
अतीब एजाज़
गुमाँ के तन पे यक़ीं का लिबास रहने दो
अतीब एजाज़
तिलिस्म-ए-शब से बहुत बे-ख़बर चले आए
अताउर्रहमान क़ाज़ी
शोहरत-ए-फ़न बहुत हुई दाद कमाल दे गए
अताउर्रहमान जमील
कुछ ख़्वाब कुछ ख़याल में मस्तूर हो गए
अताउर्रहमान जमील
कहाँ गए शब-ए-महताब के जमाल-ज़दा
अताउर्रहमान जमील
एक फ़लर्ट लड़की
अताउल हक़ क़ासमी
वो सुकून-ए-जिस्म-ओ-जाँ गिर्दाब-ए-जाँ होने को है
अताउल हक़ क़ासमी
वो एक शख़्स कि मंज़िल भी रास्ता भी है
अताउल हक़ क़ासमी
वह एक शख़्स कि मंज़िल भी रास्ता भी है
अताउल हक़ क़ासमी
तराश और भी अपने तसव्वुर-ए-रब को
अता तुराब
नुमू-पज़ीर हूँ हर दम कि मुझ में दम है अभी
अता तुराब
दिलों के दर्द जगा ख़्वाहिशों के ख़्वाब सजा
अता शाद
पारसाओं ने बड़े ज़र्फ़ का इज़हार किया
अता शाद
दिलों के दर्द जगा ख़्वाहिशों के ख़्वाब सजा
अता शाद
सब ख़्वाब पुराने हैं हर चंद फ़साने हैं
अता आबिदी
ख़्वाब ही ख़्वाब की ताबीर हुआ तो जाना
अता आबिदी
तुझ को ख़िफ़्फ़त से बचा लूँ पानी
अता आबिदी
तीरगी शम्अ बनी राहगुज़र में आई
अता आबिदी
साँसों के तआक़ुब में हैरान मिली दुनिया
अता आबिदी
पस-ए-दीवार हुज्जत किस लिए है
अता आबिदी
क्यूँ जवानी की मुझे याद आई
असरार-उल-हक़ मजाज़
ऐ शौक़-ए-नज़ारा क्या कहिए नज़रों में कोई सूरत ही नहीं
असरार-उल-हक़ मजाज़
तआरुफ़
असरार-उल-हक़ मजाज़
रात और रेल
असरार-उल-हक़ मजाज़