Hope Poetry (page 109)
समाअ'त के लिए इक इम्तिहाँ है
बकुल देव
हमें रास आनी है राहों की गठरी
बकुल देव
हमें देखा न कर उड़ती नज़र से
बकुल देव
हादसात अब के सफ़र में नए ढब से आए
बकुल देव
पड़े हैं राह में जो लोग बे-सबब कब से
बख़्श लाइलपूरी
हुसूल-ए-मंज़िल-ए-जाँ का हुनर नहीं आया
बख़्श लाइलपूरी
रखा सर पर जो आया यार का ख़त
बहराम जी
कुफ़्र एक रंग-ए-क़ुदरत-ए-बे-इंतिहा में है
बहराम जी
कब तसव्वुर यार-ए-गुल-रुख़्सार का फ़े'अल-ए-अबस
बहराम जी
हम न बुत-ख़ाने में ने मस्जिद-ए-वीराँ में रहे
बहराम जी
ग़मगीं नहीं हूँ दहर में तो शाद भी नहीं
बहराम जी
दुनिया में इबादत को तिरी आए हुए हैं
बहराम जी
बहस क्यूँ है काफ़िर-ओ-दीं-दार की
बहराम जी
तू कहीं हो दिल-ए-दीवाना वहाँ पहुँचेगा
ज़फ़र
तमन्ना है ये दिल में जब तलक है दम में दम अपने
ज़फ़र
सब मिटा दें दिल से हैं जितनी कि उस में ख़्वाहिशें
ज़फ़र
बुलबुल को बाग़बाँ से न सय्याद से गिला
ज़फ़र
ज़ुल्फ़ जो रुख़ पर तिरे ऐ मेहर-ए-तलअत खुल गई
ज़फ़र
या मुझे अफ़सर-ए-शाहाना बनाया होता
ज़फ़र
वो सौ सौ अठखटों से घर से बाहर दो क़दम निकले
ज़फ़र
वाँ इरादा आज उस क़ातिल के दिल में और है
ज़फ़र
तुफ़्ता-जानों का इलाज ऐ अहल-ए-दानिश और है
ज़फ़र
रुख़ जो ज़ेर-ए-सुंबल-ए-पुर-पेच-ओ-ताब आ जाएगा
ज़फ़र
नहीं इश्क़ में इस का तो रंज हमें कि क़रार ओ शकेब ज़रा न रहा
ज़फ़र
न दाइम ग़म है ने इशरत कभी यूँ है कभी वूँ है
ज़फ़र
लगता नहीं है दिल मिरा उजड़े दयार में
ज़फ़र
क्यूँकि हम दुनिया में आए कुछ सबब खुलता नहीं
ज़फ़र
क्या कुछ न किया और हैं क्या कुछ नहीं करते
ज़फ़र
काफ़िर तुझे अल्लाह ने सूरत तो परी दी
ज़फ़र
हम ये तो नहीं कहते कि ग़म कह नहीं सकते
ज़फ़र