Hope Poetry (page 110)

गई यक-ब-यक जो हवा पलट नहीं दिल को मेरे क़रार है

ज़फ़र

देखो इंसाँ ख़ाक का पुतला बना क्या चीज़ है

ज़फ़र

भरी है दिल में जो हसरत कहूँ तो किस से कहूँ

ज़फ़र

बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो न थी

ज़फ़र

यास की कोहर में लिपटा हुआ चेहरा देखा

बाग़ हुसैन कमाल

क़दमों से इतना दूर किनारा कभी न था

बद्र-ए-आलम ख़लिश

निशान-ए-ज़ख़्म पे निश्तर-ज़नी जो होने लगी

बद्र-ए-आलम ख़लिश

कहीं सुब्ह-ओ-शाम के दरमियाँ कहीं माह-ओ-साल के दरमियाँ

बद्र-ए-आलम ख़लिश

गौरय्यों ने जश्न मनाया मेरे आँगन बारिश का

बद्र-ए-आलम ख़लिश

दमक उठी है फ़ज़ा माहताब-ए-ख़्वाब के साथ

बद्र-ए-आलम ख़लिश

क़ातिल की सारी साज़िशें नाकाम ही रहीं

बद्र वास्ती

नवेद-ए-सफ़र

बद्र वास्ती

ख़बर शाकी है

बद्र वास्ती

तुम्हारे दिल में जो ग़म बसा है तो मैं कहाँ हूँ

बद्र वास्ती

फ़िक्र-ए-अहल-ए-हुनर पे बैठी है

बद्र वास्ती

जो झुक के मिलते थे जलसों में मेहरबाँ की तरह

बदनाम नज़र

गुम-शुदा मौसम का आँखों में कोई सपना सा था

बदनाम नज़र

मुझ को नहीं मालूम कि वो कौन है क्या है

बदीउज़्ज़माँ ख़ावर

खड़ा था कौन कहाँ कुछ पता चला ही नहीं

बदीउज़्ज़माँ ख़ावर

आग ही काश लग गई होती

बदीउज़्ज़माँ ख़ावर

दिल से आख़िर चराग़-ए-वस्ल बुझा

बाबर रहमान शाह

मान लो साहिबो कहा मेरा

बाबर रहमान शाह

दिल ने हम से अजब ही काम लिया

बाबर रहमान शाह

वही जिंस-ए-वफ़ा आख़िर फ़राहम होती जाती है

बीएस जैन जौहर

नग़्मे तड़प रहे हैं दिल-ए-बे-क़रार में

बीएस जैन जौहर

जाने फिर तुम से मुलाक़ात कभी हो कि न हो

बीएस जैन जौहर

जाने फिर तुम से मुलाक़ात कभी हो कि न हो

बीएस जैन जौहर

इक हूक सी जब दिल में उट्ठी जज़्बात हमारे आ पहुँचे

बीएस जैन जौहर

पर सऊबत रास्तों की गर्मियाँ भी दे गया

अज़रा वहीद

मसअले ज़ेर-ए-नज़र कितने थे

अज़रा वहीद