Hope Poetry (page 123)
किसी और को मैं तिरे सिवा नहीं चाहता
अताउल हसन
वो एक शख़्स कि मंज़िल भी रास्ता भी है
अताउल हक़ क़ासमी
उसे अब भूल जाने का इरादा कर लिया है
अताउल हक़ क़ासमी
वो गर्द है कि वक़्त से ओझल तो मैं भी हूँ
अताउल हक़ क़ासमी
वो एक शख़्स कि मंज़िल भी रास्ता भी है
अताउल हक़ क़ासमी
वह एक शख़्स कि मंज़िल भी रास्ता भी है
अताउल हक़ क़ासमी
क्या क्या न प्यास जागे मिरे दिल के दश्त में
अता तुराब
तन्हाइयों के दश्त में भागे जो रात भर
अता तुराब
दिल वो सहरा है जहाँ हसरत-ए-साया भी नहीं
अता शाद
ज़िंदगी आईना है आईना-आराई है
अता शाद
मैं ज़ख़्म ज़ख़्म रहूँ रूह के ख़राबों से
अता शाद
गहरी है शब की आँच कि ज़ंजीर-ए-दर कटे
अता शाद
सब्र की हद भी तो कुछ होती है
अता आबिदी
कोई भी ख़ुश नहीं है इस ख़बर से
अता आबिदी
तुझ को ख़िफ़्फ़त से बचा लूँ पानी
अता आबिदी
तीरगी शम्अ बनी राहगुज़र में आई
अता आबिदी
तमाशा ज़िंदगी का रोज़ ओ शब है
अता आबिदी
पस-ए-दीवार हुज्जत किस लिए है
अता आबिदी
कोई भी ख़ुश नहीं है इस ख़बर से
अता आबिदी
फिर किसी के सामने चश्म-ए-तमन्ना झुक गई
असरार-उल-हक़ मजाज़
मुझ को ये आरज़ू वो उठाएँ नक़ाब ख़ुद
असरार-उल-हक़ मजाज़
हिन्दू चला गया न मुसलमाँ चला गया
असरार-उल-हक़ मजाज़
उन का जश्न-ए-साल-गिरह
असरार-उल-हक़ मजाज़
तिफ़्ली के ख़्वाब
असरार-उल-हक़ मजाज़
शरारे
असरार-उल-हक़ मजाज़
शम-ए-रह-गुज़र
असरार-उल-हक़ मजाज़
शहर-ए-निगार
असरार-उल-हक़ मजाज़
सरमाया-दारी
असरार-उल-हक़ मजाज़
साक़ी
असरार-उल-हक़ मजाज़
सानेहा
असरार-उल-हक़ मजाज़