Hope Poetry (page 126)
तू अपने शहर-ए-तरब से न पूछ हाल मिरा
असलम महमूद
सराब-ए-मअनी-ओ-मफ़्हूम में भटकते हैं
असलम महमूद
सफ़र से पहले सराबों का सिलसिला रख आए
असलम महमूद
रात आती है तो ताक़ों में जलाते हैं चराग़
असलम महमूद
पत्थरों पर वादियों में नक़्श-ए-पा मेरा भी है
असलम महमूद
नए पैकर नए साँचे में ढलना चाहता हूँ मैं
असलम महमूद
मिज़ा पे ख़्वाब नहीं इंतिज़ार सा कुछ है
असलम महमूद
मैं एक रेत का पैकर था और बिखर भी गया
असलम महमूद
क्यूँ मुझ से गुरेज़ाँ है मैं तेरा मुक़द्दर हूँ
असलम महमूद
किया गर्दिशों के हवाले उसे चाक पर रख दिया
असलम महमूद
बुझ गए मंज़र उफ़ुक़ पर हर निशाँ मद्धम हुआ
असलम महमूद
अक्स जल जाएँगे आईने बिखर जाएँगे
असलम महमूद
ज़लज़ले का ख़ौफ़ तारी है दर-ओ-दीवार पर
असलम कोलसरी
सीने में सुलगते हुए लम्हात का जंगल
असलम कोलसरी
क़रीब आ के भी इक शख़्स हो सका न मिरा
असलम कोलसरी
हर-चंद बे-नवा है कोरे घड़े का पानी
असलम कोलसरी
दिल-ए-पुर-ख़ूँ को यादों से उलझता छोड़ देते हैं
असलम कोलसरी
आरज़ू-ए-दवाम करता हूँ
असलम कोलसरी
सुबुक सा दर्द था उठता रहा जो ज़ख़्मों से
असलम हबीब
लुटी बहार का सूखा गुलाब रहने दो
असलम हबीब
ज़द पे आ जाएगा जो कोई तो मर जाएगा
असलम फ़र्रुख़ी
ये हिकायत तमाम को पहुँची
असलम फ़र्रुख़ी
हंगामा-ए-हस्ती से गुज़र क्यूँ नहीं जाते
असलम फ़र्रुख़ी
आग सी लग रही है सीने में
असलम फ़र्रुख़ी
नमी उतर गई धरती में तह-ब-तह 'असलम'
असलम इमादी
नर्म आवाज़ों के बीच
असलम इमादी
खोखले बर्तन के होंट
असलम इमादी
इंतिज़ार
असलम इमादी
अब रात आ रही है
असलम इमादी
वहाँ हर एक इसी नश्शा-ए-अना में है
असलम इमादी