Hope Poetry (page 143)

रहते हुए क़रीब जुदा हो गए हो तुम

अनवर साबरी

लब पे काँटों के है फ़रियाद-ओ-बुका मेरे बाद

अनवर साबरी

हर साँस में ख़ुद अपने न होने का गुमाँ था

अनवर साबरी

दौर-ए-हाज़िर हो गया है इस क़दर कम-आश्ना

अनवर साबरी

अता-ए-ग़म पे भी ख़ुश हूँ मिरी ख़ुशी क्या है

अनवर साबरी

हो सकता है कोई हमें भी ढूँडे इन बंजारों में

अनवर नदीम

मंज़िल-ए-शौक़

अनवर नदीम

कहीं और ही चलना होगा

अनवर नदीम

हो सकता है कोई हमें भी ढूँडे इन बंजारों में

अनवर नदीम

अकेला पा के मुझ को याद उन की आ तो जाती है

अनवर मिर्ज़ापुरी

ऐ काश हमारी क़िस्मत में ऐसी भी कोई शाम आ जाए

अनवर मिर्ज़ापुरी

वादा-ए-शाम-ए-फ़र्दा पे ऐ दिल मुझे गर यक़ीं ही न आए तो मैं क्या करूँ

अनवर मिर्ज़ापुरी

मैं तो समझा था जिस वक़्त मुझ को वो मिलेंगे तो जन्नत मिलेगी

अनवर मिर्ज़ापुरी

किसी सूरत भी नींद आती नहीं मैं कैसे सो जाऊँ

अनवर मिर्ज़ापुरी

इस वास्ते दामन चाक किया शायद ये जुनूँ काम आ जाए

अनवर मिर्ज़ापुरी

मख़मली ख़्वाब का आँखों में न मंज़र फैला

अनवर मीनाई

गुम कर दें इक ज़रा तुझे ख़्वाबों के शहर में

अनवर मीनाई

सर-दर्द में गोली ये बड़ी ज़ूद-असर है

अनवर मसूद

मैं देख भी न सका मेरे गिर्द क्या गया था

अनवर मसूद

जो बारिशों में जले तुंद आँधियों में जले

अनवर मसूद

इशारतों की वो शर्हें वो तज्ज़िया भी गया

अनवर मसूद

इस इब्तिदा की सलीक़े से इंतिहा करते

अनवर मसूद

दर्द बढ़ता ही रहे ऐसी दवा दे जाओ

अनवर मसूद

बस यूँही इक वहम सा है वाक़िआ ऐसा नहीं

अनवर मसूद

अब कहाँ और किसी चीज़ की जा रक्खी है

अनवर मसूद

छत पर बारिश बरस रही है

अनवर ख़ान

हवा के साथ उड़ जाएगा पानी

अनवर ख़ान

शहर की गलियों और सड़कों पर फिरते हैं मायूसी में

अनवर जमाल अनवर

ज़िंदगी अपनी ख़्वाब जैसी है

अनवर जमाल अनवर

क़याम-गाह न कोई न कोई घर मेरा

अनवर जलालपुरी