Hope Poetry (page 142)

न सह सकूँगा ग़म-ए-ज़ात गो अकेला मैं

अनवर शऊर

मुझे ये जुस्तुजू क्यूँ हो कि क्या हूँ और किया था मैं

अनवर शऊर

ख़त्म हर अच्छा बुरा हो जाएगा

अनवर शऊर

काफ़ी नहीं ख़ुतूत किसी बात के लिए

अनवर शऊर

जो सुनता हूँ कहूँगा मैं जो कहता हूँ सुनूँगा मैं

अनवर शऊर

गो कठिन है तय करना उम्र का सफ़र तन्हा

अनवर शऊर

और न दर-ब-दर फिरा और न आज़मा मुझे

अनवर शऊर

अकेले क्या पस-ए-दीवार-ओ-दर गए हम तुम

अनवर शऊर

ऐसे देखा है कि देखा ही न हो

अनवर शऊर

क्या होना मुमकिन है

अनवर सेन रॉय

ख़्वाबों को समझौते रास नहीं आते

अनवर सेन रॉय

इज़ाफ़ी ज़रूरतों के लिए एक नज़्म

अनवर सेन रॉय

ब'अद-अज़-मर्ग

अनवर सेन रॉय

अपने लिए एक नौहा

अनवर सेन रॉय

रंगीं बना के दामन-ए-ज़ख़्म-ए-जिगर को मैं

अनवर सहारनपुरी

क्यूँ ख़फ़ा हम से हो ख़ता क्या है

अनवर सहारनपुरी

जल्वे दिखाए यार ने अपनी हरीम-ए-नाज़ में

अनवर सहारनपुरी

एक ख़्वाहिश

अनवर सदीद

ज़ोर से आँधी चली तो बुझ गए सारे चराग़

अनवर सदीद

उस की अना के बुत को बड़ा कर के देखते

अनवर सदीद

साँसों में मिल गई तिरी साँसों की बास थी

अनवर सदीद

सफ़ीना ले गए मौजों की गर्म-जोशी में

अनवर सदीद

आरज़ू थी ये बिखेरें अपनी किरनें सुब्ह तक

अनवर सदीद

आरज़ू ने जिस की पोरों तक था सहलाया मुझे

अनवर सदीद

ज़ुल्मतों में रौशनी की जुस्तुजू करते रहो

अनवर साबरी

ज़िंदगी के हसीं बहाने से

अनवर साबरी

वक़्त जब करवटें बदलता है

अनवर साबरी

उम्र गुज़री है इल्तिजा करते

अनवर साबरी

तसव्वुर के सहारे यूँ शब-ए-ग़म ख़त्म की मैं ने

अनवर साबरी

शब-ए-फ़िराक़ की ज़ुल्मत है ना-गवार मुझे

अनवर साबरी