Hope Poetry (page 155)
क्यूँ अम्बर की पहनाई में चुप की राह टटोलें
अम्बरीन सलाहुद्दीन
जब मिरे शहर की हर शाम ने देखा उस को
अम्बरीन सलाहुद्दीन
असीर-ए-ख़्वाब नई जुस्तुजू के दर खोलें
अम्बरीन सलाहुद्दीन
वो मसीहा न बना हम ने भी ख़्वाहिश नहीं की
अंबरीन हसीब अंबर
सितारा-बार बन जाए नज़र ऐसा नहीं होता
अंबरीन हसीब अंबर
शब थी बे-ख़्वाब इक आरज़ू देर तक
अंबरीन हसीब अंबर
मैं ने सोचा है रात-भर तुम को
अंबरीन हसीब अंबर
कब मौसम-ए-बहार पुकारा नहीं किया
अंबरीन हसीब अंबर
जिस्म-ओ-जाँ में दर आई इस क़दर अज़िय्यत क्यूँ
अंबरीन हसीब अंबर
जब से ज़िंदगी हुआ दिल गर्दिश-ए-तक़दीर का
अंबरीन हसीब अंबर
इस आरज़ी दुनिया में हर बात अधूरी है
अंबरीन हसीब अंबर
अयाँ दोनों से तक्मील-ए-जहाँ है
अंबरीन हसीब अंबर
अब असीरी की ये तदबीर हुई जाती है
अंबरीन हसीब अंबर
साएबाँ क्या अब्र का टुकड़ा है क्या
अम्बर शमीम
कोई दीवार न दर बाक़ी है
अम्बर शमीम
मुश्किल को समझने का वसीला निकल आता
अम्बर खरबंदा
मुझे ख़बर है मुझे यक़ीं है
अम्बर बहराईची
हम ख़्वाब-ज़दा
अम्बर बहराईची
हर लम्हा सैराबी की अर्ज़ानी है
अम्बर बहराईची
गीली मिट्टी हाथ में ले कर बैठा हूँ
अम्बर बहराईची
बुरीदा बाज़ुओं में वो परिंद लाला-बार था
अम्बर बहराईची
फिर कोई मुश्किल जवाँ होने को है
अमर सिंह फ़िगार
जोश-ए-तकमील-ए-तमन्ना है ख़ुदा ख़ैर करे
अमर सिंह फ़िगार
जब कोई रास्ता नहीं होता
अमर सिंह फ़िगार
बैठा है सोगवार सितमगर के शहर में
अमर सिंह फ़िगार
ज़मज़मा किस की ज़बाँ पर ब-दिल-ए-शाद आया
अमानत लखनवी
रवाँ दवाँ नहीं याँ अश्क चश्म-ए-तर की तरह
अमानत लखनवी
आग़ोश में जो जल्वागर इक नाज़नीं हुआ
अमानत लखनवी
समुंदरों को उठाए फिरी घटा बरसों
अल्ताफ़ परवाज़
सबा की बात सुनें फूल से कलाम करें
अल्ताफ़ परवाज़