Hope Poetry (page 198)
काँटा सा जो चुभा था वो लौ दे गया है क्या
अदा जाफ़री
जो चराग़ सारे बुझा चुके उन्हें इंतिज़ार कहाँ रहा
अदा जाफ़री
जब दिल की रहगुज़र पे तिरा नक़्श-ए-पा न था
अदा जाफ़री
होंटों पे कभी उन के मिरा नाम ही आए
अदा जाफ़री
हिस नहीं तड़प नहीं बाब-ए-अता भी क्यूँ खुले
अदा जाफ़री
हर गाम सँभल सँभल रही थी
अदा जाफ़री
हर इक दरीचा किरन किरन है जहाँ से गुज़रे जिधर गए हैं
अदा जाफ़री
गुलों सी गुफ़्तुगू करें क़यामतों के दरमियाँ
अदा जाफ़री
गुलों को छू के शमीम-ए-दुआ नहीं आई
अदा जाफ़री
घर का रस्ता भी मिला था शायद
अदा जाफ़री
एक आईना रू-ब-रू है अभी
अदा जाफ़री
ढलके ढलके आँसू ढलके
अदा जाफ़री
बेगानगी-ए-तर्ज़-ए-सितम भी बहाना-साज़
अदा जाफ़री
अचानक दिलरुबा मौसम का दिल-आज़ार हो जाना
अदा जाफ़री
आँखों में रूप सुब्ह की पहली किरन सा है
अदा जाफ़री
आगे हरीम-ए-ग़म से कोई रास्ता न था
अदा जाफ़री
क़फ़स से छुटने पे शाद थे हम कि लज़्ज़त-ए-ज़िंदगी मिलेगी
अबुल मुजाहिद ज़ाहिद
हर एहतिमाम है दो दिन की ज़िंदगी के लिए
अबुल मुजाहिद ज़ाहिद
इन शोख़ हसीनों की अदा और ही कुछ है
अबुल कलाम आज़ाद
शिकस्त-ए-अहद पर इस के सिवा बहाना भी क्या
अबुल हसनात हक़्क़ी
ज़ब्त कर आह बार बार न कर
अबू ज़ाहिद सय्यद यहया हुसैनी क़द्र
मुश्किल है पता चलना क़िस्सों से मोहब्बत का
अबू ज़ाहिद सय्यद यहया हुसैनी क़द्र
ख़ामोश इस तरह से न जल कर धुआँ उठा
अबू ज़ाहिद सय्यद यहया हुसैनी क़द्र
है आम अज़ल ही से फ़ैज़ान मोहब्बत का
अबू ज़ाहिद सय्यद यहया हुसैनी क़द्र
तसव्वुरात में इन को बुला के देख लिया
अबु मोहम्मद वासिल
मसरूर हो रहे हैं ग़म-ए-आशिक़ी से हम
अबु मोहम्मद वासिल
जबीन-ए-शौक़ पर कोई हुआ है मेहरबाँ शायद
अबु मोहम्मद वासिल
हसरत-ए-दीद रही दीद का ख़्वाहाँ हो कर
अबु मोहम्मद वासिल
अगर मेरी जबीन-ए-शौक़ वक़्फ़-ए-बंदगी होती
अबु मोहम्मद वासिल
तकमील-ए-आरज़ू से भी होता है ग़म कभी
अबु मोहम्मद सहर