Hope Poetry (page 64)
मिरे वजूद को परछाइयों ने तोड़ दिया
फ़ाज़िल जमीली
मेरे होंटों पे तेरे नाम की लर्ज़िश तो नहीं
फ़ाज़िल जमीली
ख़ुमार-ए-शब में तिरा नाम लब पे आया क्यूँ
फ़ाज़िल जमीली
हम ने किसी की याद में अक्सर शराब पी
फ़ाज़िल जमीली
अब तो अश्कों की रवानी में न रक्खी जाए
फ़ाज़िल जमीली
न सनम-कदों की है जुस्तुजू न ख़ुदा के घर की तलाश है
फ़ाज़िल अंसारी
कोहसारों में नहीं है कि बयाबाँ में नहीं
फ़ाज़िल अंसारी
हुई दिल टूटने पर इस तरह दिल से फ़ुग़ाँ पैदा
फ़ाज़िल अंसारी
गुलज़ार में एक फूल भी ख़ंदाँ तो नहीं है
फ़ाज़िल अंसारी
दिल के मकाँ में आँख के आँगन में कुछ न था
फ़ाज़िल अंसारी
बशर की ज़ात में शर के सिवा कुछ और नहीं
फ़ाज़िल अंसारी
अश्क आया आँख में जलता हुआ
फ़ाज़िल अंसारी
शगुफ़्ता बाग़-ए-सुख़न है हमीं से ऐ 'साबिर'
फ़ज़ल हुसैन साबिर
इधर भी देख ज़रा बे-क़रार हम भी हैं
फ़ज़ल हुसैन साबिर
है जो ख़ामोश बुत-ए-होश-रुबा मेरे बाद
फ़ज़ल हुसैन साबिर
ये तमाशा दीदनी ठहरा मगर देखेगा कौन
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
अच्छा हुआ मैं वक़्त के मेहवर से कट गया
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
तू है मअ'नी पर्दा-ए-अल्फ़ाज़ से बाहर तो आ
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
सुलगना अंदर अंदर मिस्रा-ए-तर सोचते रहना
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
रूह और बदन दोनों दाग़ दाग़ हैं यारो
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
न दामनों में यहाँ ख़ाक-ए-रहगुज़र बाँधो
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
मुद्दतों के बाद फिर कुंज-ए-हिरा रौशन हुआ
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
मैं ख़ुद हूँ नक़्द मगर सौ उधार सर पर है
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
मैं ही इक शख़्स था यारान-ए-कुहन में ऐसा
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
लहू ही कितना है जो चश्म-ए-तर से निकलेगा
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
खुला न मुझ से तबीअत का था बहुत गहरा
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
जुरअत-ए-इज़हार से रोकेगी क्या
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
हाथ फैलाओ तो सूरज भी सियाही देगा
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
फ़ुज़ूल शय हूँ मिरा एहतिराम मत करना
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
और क्या मुझ से कोई साहिब-नज़र ले जाएगा
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी