Hope Poetry (page 63)
फूलों को गुलिस्ताँ में कब रास बहार आई
फ़िगार उन्नावी
किसी से शिकवा-ए-महरूमी-ए-नियाज़ न कर
फ़िगार उन्नावी
का'बे में हो या बुत-ख़ाने में होने को तो सर ख़म होता है
फ़िगार उन्नावी
हसरत-ए-दिल ना-मुकम्मल है किताब-ए-ज़िंदगी
फ़िगार उन्नावी
इक तेरा आसरा है फ़क़त ऐ ख़याल-ए-दोस्त
फ़िगार उन्नावी
एक ख़्वाब-ओ-ख़याल है दुनिया
फ़िगार उन्नावी
तुम हरीम-ए-नाज़ में बैठे हो बेगाने बने
फ़िगार उन्नावी
तूफ़ाँ से बच के दामन-ए-साहिल में रह गया
फ़िगार उन्नावी
लब पे झूटे तराने होते हैं
फ़िगार उन्नावी
किसी अपने से होती है न बेगाने से होती है
फ़िगार उन्नावी
जुरअत-ए-इश्क़ हवस-कार हुई जाती है
फ़िगार उन्नावी
जफ़ा-ए-यार को हम लुत्फ़-ए-यार कहते हैं
फ़िगार उन्नावी
हस्ती इक नक़्श-ए-इनइकासी है
फ़िगार उन्नावी
चला हूँ अपनी मंज़िल की तरफ़ तो शादमाँ हो कर
फ़िगार उन्नावी
आरज़ू हसरत-ए-नाकाम से आगे न बढ़ी
फ़िगार उन्नावी
तिरी जुस्तुजू में देखा मैं कहाँ कहाँ से गुज़रा
फ़िगार मुरादाबादी
ख़राब-हाल हूँ हर हाल में ख़राब रहा
फ़ज़लुर्रहमान
इस कमरे में ख़्वाब रक्खे थे कौन यहाँ पर आया था
फ़ज़्ल ताबिश
इन आँखों में बिन बोले भी मादर-ज़ाद तक़ाज़ा है
फ़ज़्ल ताबिश
तुम्हीं इक नहीं जाँ-सेताँ और भी हैं
फ़ज़्ल अहमद करीम फ़ज़ली
तामीर-ए-नौ क़ज़ा-ओ-क़दर की नज़र में है
फ़ज़्ल अहमद करीम फ़ज़ली
ग़मों से खेलते रहना कोई हँसी भी नहीं
फ़ज़्ल अहमद करीम फ़ज़ली
बहार आई गुल-अफ़्शानी के दिन हैं
फ़ज़्ल अहमद करीम फ़ज़ली
तुम कभी एक नज़र मेरी तरफ़ भी देखो
फ़ाज़िल जमीली
इस कॉकटेल का तो नशा ही कुछ और है
फ़ाज़िल जमीली
तुम ने पूछा है तो अहवाल बता देते हैं
फ़ाज़िल जमीली
सुख़न जो उस ने कहे थे गिरह से बाँध लिए
फ़ाज़िल जमीली
शौक़ीन मिज़ाजों के रंगीन तबीअ'त के
फ़ाज़िल जमीली
मिसाल-ए-शम्अ जला हूँ धुआँ सा बिखरा हूँ
फ़ाज़िल जमीली
मिलने का भी आख़िर कोई इम्कान बनाते
फ़ाज़िल जमीली