Hope Poetry (page 67)
छाँव की शक्ल धूप की रंगत बदल गई
फ़ारूक़ शफ़क़
जब कोई नौजवान मरता है
फ़ारूक़ नाज़की
ये कैसी रुत आ गई जुनूँ की
फ़ारूक़ नाज़की
मौत
फ़ारूक़ नाज़की
एक नज़्म जंगलों के नाम
फ़ारूक़ नाज़की
और मैं चुप रहा
फ़ारूक़ नाज़की
पूरे क़द से मैं खड़ा हूँ सामने आएगा क्या
फ़ारूक़ नाज़की
मेरे चेहरे की स्याही का पता दे कोई
फ़ारूक़ नाज़की
इतनी ख़राब सूरत-ए-हालात भी नहीं
फ़ारूक़ नाज़की
दर्द की रात गुज़रती है मगर आहिस्ता
फ़ारूक़ नाज़की
शहर की आँखों में
फ़ारूक़ मुज़्तर
अपनी आग में
फ़ारूक़ मुज़्तर
उजले माथे पे नाम लिख रक्खें
फ़ारूक़ मुज़्तर
शफ़क़-ए-शब से उभरता हुआ सूरज सोचें
फ़ारूक़ मुज़्तर
न पानियों का इज़्तिरार शहर में
फ़ारूक़ मुज़्तर
मैं ताइर-ए-वजूद या बर्ग-ए-ख़याल था
फ़ारूक़ मुज़्तर
तुम्हारे क़स्र-आज़ादी के मेमारों ने क्या पाया
फ़ारूक़ बाँसपारी
ख़ुशी से फूलें न अहल-ए-सहरा अभी कहाँ से बहार आई
फ़ारूक़ बाँसपारी
कभी बे-नियाज़-ए-मख़्ज़न कभी दुश्मन-ए-किनारा
फ़ारूक़ बाँसपारी
दिल-ए-ईज़ा-तलब ले तेरा कहना कर लिया मैं ने
फ़ारूक़ बाँसपारी
वो चाँद-चेहरा सी एक लड़की
फ़ारूक़ बख़्शी
जब हम पहली बार मिले थे
फ़ारूक़ बख़्शी
वो न आएगा यहाँ वो नहीं आने वाला
फ़ारूक़ बख़्शी
उस के होंटों पे बद-दुआ' भी नहीं
फ़ारूक़ बख़्शी
रेज़ा रेज़ा सा भला मुझ में बिखरता क्या हे
फ़ारूक़ बख़्शी
महकते लफ़्ज़ों में शामिल है रंग-ओ-बू किस की
फ़ारूक़ बख़्शी
कैसे इन सच्चे जज़्बों की अब उस तक तफ़्हीम करूँ
फ़ारूक़ बख़्शी
जली हैं दर्द की शमएँ मगर अंधेरा है
फ़ारूक़ बख़्शी
जैसी ख़्वाहिश होती हे कब होता हे
फ़ारूक़ बख़्शी
इस ज़मीं आसमाँ के थे ही नहीं
फ़ारूक़ बख़्शी