Hope Poetry (page 68)
बिछड़ना मुझ से तो ख़्वाबों में सिलसिला रखना
फ़ारूक़ बख़्शी
तारे शुमार करते हैं रो रो के रात भर
फ़ारूक़ अंजुम
शहर की फ़सीलों पर ज़ख़्म जगमगाएँगे
फ़ारूक़ अंजुम
सब्ज़ मौसम की रिफ़ाक़त उस का कारोबार है
फ़ारूक़ अंजुम
परिंदे खेत में अब तक पड़ाव डाले हैं
फ़ारूक़ अंजुम
मैं मो'तबर हूँ इश्क़ मिरा मो'तबर नहीं
फ़ारूक़ अंजुम
जब भी मिला वो टूट के हम से मिला तो है
फ़ारूक़ अंजुम
मचलती है मिरे सीने में तेरी आरज़ू क्या क्या
फ़रोग़ हैदराबादी
दिल नहीं मिलने का फिर मेरा सितमगर टूट कर
फ़रोग़ हैदराबादी
हमारे कमरे में पत्तियों की महक ने
फरीहा नक़वी
एक सौ बीस दिन
फरीहा नक़वी
एक पुराना ख़्वाब
फरीहा नक़वी
तुम्हें पाने की हैसिय्यत नहीं है
फरीहा नक़वी
यही है दौर-ए-ग़म-ए-आशिक़ी तो क्या होगा
फ़ारिग़ बुख़ारी
यादों का अजीब सिलसिला है
फ़ारिग़ बुख़ारी
वो रोज़-ओ-शब भी नहीं हैं वो रंग-ओ-बू भी नहीं
फ़ारिग़ बुख़ारी
वो रोज़-ओ-शब भी नहीं है वो रंग-ओ-बू भी नहीं
फ़ारिग़ बुख़ारी
रंग-दर-रंग हिजाबात उठाने होंगे
फ़ारिग़ बुख़ारी
जंगल उगा था हद्द-ए-नज़र तक सदाओं का
फ़ारिग़ बुख़ारी
जबीं का चाँद बनूँ आँख का सितारा बनूँ
फ़ारिग़ बुख़ारी
हुए हैं सर्द दिमाग़ों के दहके दहके अलाव
फ़ारिग़ बुख़ारी
हवास लूट लिए शोरिश-ए-तमन्ना ने
फ़ारिग़ बुख़ारी
दो घड़ी बैठे थे ज़ुल्फ़-ए-अम्बरीं की छाँव में
फ़ारिग़ बुख़ारी
देखे कोई जो चाक-ए-गरेबाँ के पार भी
फ़ारिग़ बुख़ारी
देख कर उस हसीन पैकर को
फ़ारिग़ बुख़ारी
अपने ही साए में था में शायद छुपा हुआ
फ़ारिग़ बुख़ारी
मैं शायद तेरे दुख में मर गया हूँ
फ़रहत शहज़ाद
ये ज़मीं ख़्वाब है आसमाँ ख़्वाब है
फ़रहत शहज़ाद
शाम कहती है कोई बात जुदा सी लिक्खूँ
फ़रहत शहज़ाद
सौत क्या शय है ख़ामुशी क्या है
फ़रहत शहज़ाद