Hope Poetry (page 70)
रूह को तो इक ज़रा सी रौशनी दरकार है
फ़रहत एहसास
रास्ते हम से राज़ कहने लगे
फ़रहत एहसास
रास्ता दे ऐ हुजूम-ए-शहर घर जाएँगे हम
फ़रहत एहसास
पुराना ज़ख़्म जिसे तजरबा ज़ियादा है
फ़रहत एहसास
पैकर-ए-अक़्ल तिरे होश ठिकाने लग जाएँ
फ़रहत एहसास
पहले क़ब्रिस्तान आता है फिर अपनी बस्ती आती है
फ़रहत एहसास
ना-क़ाबिल-ए-यक़ीं था अगरचे शुरूअ' में
फ़रहत एहसास
मिरे सुबूत बहे जा रहे हैं पानी में
फ़रहत एहसास
मैं शहरी हूँ मगर मेरी बयाबानी नहीं जाती
फ़रहत एहसास
मैं अपने रू-ए-हक़ीक़त को खो नहीं सकता
फ़रहत एहसास
महफ़िल में अब के आओ तो ऐसी ख़ता न हो
फ़रहत एहसास
कुछ भी न कहना कुछ भी न सुनना लफ़्ज़ में लफ़्ज़ उतरने देना
फ़रहत एहसास
ख़ाक ओ ख़ूँ की नई तंज़ीम में शामिल हो जाओ
फ़रहत एहसास
खड़ी है रात अंधेरों का अज़दहाम लगाए
फ़रहत एहसास
काबा-ए-दिल दिमाग़ का फिर से ग़ुलाम हो गया
फ़रहत एहसास
काम उन आँखों की हवसनाकी की साज़िश आ गई
फ़रहत एहसास
जिस्म की कुछ और अभी मिट्टी निकाल
फ़रहत एहसास
जिस्म जब महव-ए-सुख़न हों शब-ए-ख़ामोशी से
फ़रहत एहसास
जिस को जैसा भी है दरकार उसे वैसा मिल जाए
फ़रहत एहसास
झगड़े ख़ुदा से हो गए अहद-ए-शबाब में
फ़रहत एहसास
हम को बरा-ए-दुनिया बे-जान कर दिया है
फ़रहत एहसास
हमें जब अपना तआरुफ़ कराना पड़ता है
फ़रहत एहसास
हमें जब अपना तआरुफ़ कराना पड़ता है
फ़रहत एहसास
घर में चीज़ें बढ़ रही हैं ज़िंदगी कम हो रही है
फ़रहत एहसास
इक हवा सा मिरे सीने से मिरा यार गया
फ़रहत एहसास
एक ग़ज़ल कहते हैं इक कैफ़िय्यत तारी कर लेते हैं
फ़रहत एहसास
दोनों का ला-शुऊ'र है इतना मिला हुआ
फ़रहत एहसास
दिनी हैं सब कोई राती नहीं है
फ़रहत एहसास
चराग़-ए-शहर से शम-ए-दिल-ए-सहरा जलाना
फ़रहत एहसास
बुझ गए सारे चराग़-ए-जिस्म-ओ-जाँ तब दिल जला
फ़रहत एहसास