Hope Poetry (page 98)
बाल बिखेरे आज परी तुर्बत पर मेरे आएगी
भारतेंदु हरिश्चंद्र
असीरान-ए-क़फ़स सेहन-ए-चमन को याद करते हैं
भारतेंदु हरिश्चंद्र
आ गई सर पर क़ज़ा लो सारा सामाँ रह गया
भारतेंदु हरिश्चंद्र
शायद बता दिया था किसी ने मिरा पता
भारत भूषण पन्त
इतनी सी बात रात पता भी नहीं लगी
भारत भूषण पन्त
सच्चाइयों को बर-सर-ए-पैकार छोड़ कर
भारत भूषण पन्त
पराया लग रहा था जो वही अपना निकल आया
भारत भूषण पन्त
मुस्तक़िल रोने से दिल की बे-कली बढ़ जाएगी
भारत भूषण पन्त
कुछ न कुछ सिलसिला ही बन जाता
भारत भूषण पन्त
ख़्वाहिश-ए-पर्वाज़ है तो बाल-ओ-पर भी चाहिए
भारत भूषण पन्त
ख़ुद पर जो ए'तिमाद था झूटा निकल गया
भारत भूषण पन्त
कभी सुकूँ कभी सब्र-ओ-क़रार टूटेगा
भारत भूषण पन्त
कब तक गर्दिश में रहना है कुछ तो बता अय्याम मुझे
भारत भूषण पन्त
जुस्तुजू मेरी कहीं थी और मैं भटका कहीं
भारत भूषण पन्त
इश्क़ का रोग तो विर्से में मिला था मुझ को
भारत भूषण पन्त
दीद की तमन्ना में आँख भर के रोए थे
भारत भूषण पन्त
चाहतों के ख़्वाब की ताबीर थी बिल्कुल अलग
भारत भूषण पन्त
अंधेरा मिटता नहीं है मिटाना पड़ता है
भारत भूषण पन्त
न मिला तिरा पता तो मुझे लोग क्या कहेंगे
बेताब लखनवी
तड़प के रह गई बुलबुल क़फ़स में ऐ सय्याद
बेताब अज़ीमाबादी
उन के आते ही हुआ हसरत-ओ-अरमाँ का हुजूम
बेख़ुद देहलवी
सौदा-ए-इश्क़ और है वहशत कुछ और शय
बेख़ुद देहलवी
जादू है या तिलिस्म तुम्हारी ज़बान में
बेख़ुद देहलवी
वो सुन कर हूर की तारीफ़ पर्दे से निकल आए
बेख़ुद देहलवी
वो देखते जाते हैं कनखियों से इधर भी
बेख़ुद देहलवी
वो और तसल्ली मुझे दें उन की बला दे
बेख़ुद देहलवी
टूटे पड़ते हैं ये हैं किस के ख़रीदार तमाम
बेख़ुद देहलवी
तुम हमारे दिल-ए-शैदा को नहीं जानते क्या
बेख़ुद देहलवी
शम-ए-मज़ार थी न कोई सोगवार था
बेख़ुद देहलवी
सब्र आता है जुदाई में न ख़्वाब आता है
बेख़ुद देहलवी